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पहले और बाद में

सूखा पत्ता (कविता)

ग़ज़ल

ग़ज़ल

ग़ज़ल

ठंडी हवा

चलते चलते

सूखी नदी

सड़क चौड़ी हो रही है

चलो चलकर ये...

ख़ुशबू सी हो तुम

आओ हुज़ूर हम तुम्हें

फ़िकर क्या करें

ये चलते-फिरते लोग

यहाँ (ग़ज़ल)

ख़्वाब (कविता)

अब मत रुको

इसी दिन के लिए

बूढ़ी आँखें

जब अंधेरे ने दी आवाज़

आज फिर

पत्थर के फूल

ग़ज़ल

ग़ज़ल

ग़ज़ल

ग़ज़ल