पहले और बाद में
थे वो हरे भरे पेड़
और खुश वो झाड़ियाँ
कभी।
दामन में थी खुशियां
उनके
जीवन हसीं।
जब तलक वो न था
चारो तरफ
हाहाकार न था।
कुछ डूबते और लोग उतराते न थे
गाँव का गाँव
बस्ती की बस्ती
सूनी न थी।
चारो तरफ
डर, ख़ौफ, आतंक न था
दूर तलक
वो ख़ौफ़नाक समंदर न था।
थे वो हरे भरे पेड़
और खुश वो झाड़ियाँ
कभी।
दामन में थी खुशियां
उनके
जीवन हसीं।
आज उजड़ गयी उनकी सारी दुनियाँ
सब मिट गया
शेष कुछ न रहा।
था वो पहले कभी
अब बाद में नहीं।


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