सूखा पत्ता (कविता)
सूखा पत्ता
रास्ते में चल रहा था यूँ अकेला
मन में थी कुछ बातें
बस चल रहा था अकेला
सफ़र था लंबा और सूना
मैं चल रहा था अकेला
अकेले से कुछ बात की
फिर चला बिल्कुल अकेला
नज़रें फिराई हर तरफ
बस चलता रहा अकेला
आया फिर हवा का एक झोंका
साथ था उसके एक पत्ता
छोड़ गया साथ मेरे
मैं पल भर को सोचा,
था ग़लत मैं
वो चल रहा था साथ मेरे
मैं खुश कि
मिला हमसफर था कोई
क्षण बीते नहीं कि
वो छूट गया पीछे
हवा बन्द थी
वो दूर सुस्ता रहा था
अपने अधूरे सफ़र में
उसकी नियति मान
मैं चुपचाप बढ़ चला आगे
सोचता रहा-
"काश होता वो मेरे जैसा
चलता रुकता और फिर चलता
अपनी मंज़िल आने तक।"
आ गयी थी
मंज़िल मेरी भी
यादों में शेष था
वह सूखा पत्ता!


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