अलग अलग एक जैसे
पानी पूरी की दुकान पर
भीड़ थी
मगर लोग अकेले थे
सब अलग थे
लेकिन एक जैसे
सड़क के किनारे शांत
मगर चमकीला दुकान
कोई पैदल आया
कोई ऑटो से
कोई कार से
कोई अपने कार से
कोई बस से
सबका अपना अपना अकड़ था
कोई महँगे लगते कपड़े में
भीड़ मे अलग दूर
मगर नजदीक रहने की कोशिश में था
कोई अमीरी के एहसास के लिए
उसके पास जा रहा था
मगर दूर भी था
बच्चे, बड़े, बूढ़े, जवान सब थे
कोई दूर से
कोई नज़दीक से आया था
सब अलग थे पर
सबकी नज़र
उस पानी पूरी पर थी
दही पूरी पर थी
चाट पर थी
सबके हाथ में
वही प्लास्टिक की उजली कटोरी थी
सब गरम ठंढा खा रहे थे
सबको ज्यादा पैसे
बढ़ जाने की चिंता थी
मगर दिखावे में
मानो प्रतियोगिता में खाए जा रहे थे
सब कटोरी
नीचे जमीन पर फेंक रहा था
सब के हाथ धूल रहे थे
सब अलग थे एक जैसे।


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