उस पार



 सच कहूँ तो, 

जी ऊब गया है

 इस पार ख्वाब के पंख को, 

एक एक कर

 कतरते देख कर 

हर रोज़ जाना 

काम से घर लौटना

 पैसा मिलना 

 और फिर

 पैसे का गायब हो जाना

 हरेक महीने का दर्शन 

 फिर पूरा महीना 

अंतर्ध्यान हो जाना। 

 न घर में चैन 

न काम में नाम 

सब बेकार 

निरस 

जी ऊब गया है। 

यहाँ रोशनी में

 अंधेरा है 

उस अंधेरे में 

रोशनी की चाह है 

मगर दोनों चाह है। 

यहाँ भी शांति नहीं 

वहाँ भी 

आशांति का घना अंधेरा 

ऊब गया हूँ। 

इधर से भी

 उधर से भी 

फिर भी चाह है, 

जाऊँ उस पार 

जिसे देखा नहीं 

जिसे जाना नहीं

 माना नहीं 

पहचाना नहीं। 

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