कल फ़िर
कल दिन दहाड़े
फ़िर से घटना को
उस आदमी ने अंजाम दिया
कई दिन पहले भी
आज भी
और शायद कल भी
बड़ी बर्बरता से मारा था उसे
न पाया तो दौड़ा कर मारा था
उसका कौन?
जो उसे बचा लेता
अकेला था,
दीवार के सीमाओं से घिरा था
वो बेबस था
आखिर वो क्या करता?
एक से एक प्रहार हुआ
वह भागता रहा
छुपता रहा
मगर उस रोशनी में
कब तक छुपता
उस चहारदिवारी में
कब तक बचता?
अंत में आ गया हाथों में
कटने के लिए
मरने के लिए
टूटने के लिए
बिखरने के लिए
उस पर कई प्रहार हुए
एक दो नहीं बार बार हुए
एक तरफ से नहीं
हर तरफ से हुआ
बेचारा बच न सका
उसके टुकड़े किये गए
फिर भी सांस लेता रहा
और प्रहार कब रुका?
जब तक कि
शरीर निष्पंद न हो गया
आँखों की पुतलियों ने
घूमना छोड़ दिया
दिमाग सुन्न हो गया
सारे तस्वीर रुक गए
उसकी ज़िंदगी भी रुक गयी
उसका कोई अपना न था
गुमनाम मारा गया
मारने वाले के चेहरे पर तेज था,
वह छिपकली परा निस्तेज था,
निस्पंद् था।
हैरत की बात थी
मंजर सबने देखा था
सिर्फ देखने के लिए
हंता की कुटिल निर्भिक मुस्कान
गवाह थी।
उसे कल भी
कोई नहीं रोकेगा
और कल
फ़िर घटने की आवृति हो
कौन रोकेगा?
कौन उसे सजा देगा?
क्या सिर्फ इसीलिए कि
वह एक छोटा गुमनाम था?
या फिर इसीलिए कि
उसका कोई बड़ा मजबूत समाज नहीं था?
.jpg)


Comments
Post a Comment