जीवन मृत्यु के जैसे


 

चलते चलते यूँ ही नज़र पर गयी 

पास के दरख़्त पर 

जिस के बड़े पत्ते 

सजे थे करीने से 

छोटे, बड़े मध्यम 

सब, एक पर एक 

जिससे मिला था, नीचे ज़मीन को 

साया। 

आज वही पत्ते गिर गए थे, 

 नीचे कुछ अपने 

बचपन में

अधिकांश अपने बुढ़ापे में 

सब बेतहासा गिरे थे 

मरे थे 

फिर भी 

ज़मीन को साया दे रहे थे। 

पर ये अंत था 

वो अपनों से जुदा थे 

तय था तय के इंतज़ार का। 

वो अब जमा हो चुके थे 

न चाहकर भी 

फिर से जमा होने के लिए 

किसी जीवित के द्वारा 

जलने के लिए। 

फिर मरने के लिए 

राख में, 

 फिर मिट्टी बनने के लिए 

जीवन मृत्यु के क्रम में 

सहभागी होने के लिए। 

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