ये क्या था?
हाँ तो बात कल की थी मेरा आज कल की याद दिला रहा था ट्रांस्फर के कई दिन पहले अक्सर फूल तोड़ते वक़्त वो तितली दिख जाती थी उस फूल को मैं भी नहीं तोड़ता इतना पता था आज तेरह दिन बीत गये हैं 400 कि.मी. दूर आज फिर फूल पर वही तितली बैठी मिल गयी। जान बुझ कर उसे अनदेखा किया मगर उसे कहाँ मानना था! उस फूल को छोड़ कर आगे चल दिया था तितली कभी मेरे सिर कभी बाहों पर तो कभी चेहरे के सामने भंवरा बन नाचने लगती मैं भी सोच रहा था ये क्या था? जहाँ अपने फोन नहीं उठाते बुलाने पर नहीं आते मनाने पर नहीं मानते; वो आ गया था मान गया था। मैं सोच रहा था ये क्या था?









