गाँठ रस्सी की
अभी अभी सुबह हुई थी घर के आंगन में बैठा था सब अपने काम में मसरूफ़। मैं चुपचाप शून्य में कहीं ठहरा सा कुछ सोच रहा था कुछ खोज रहा था कुछ देख रहा था कुछ धूमिल कुछ प्रकाश कुछ दोनों। हाथ में मेरे मच्छरदानी के एक कोने की रस्सी थी उस रस्सी में तीन गाँठ थे फिर भी वह रस्सी अपना पूरा काम करती जैसे बाक़ी तीनों कोने की रस्सी, बिना गाँठ के। ऊपर से सब ठीक था मगर पिछले दो सालों से मैंने भी देखा औरों ने भी। कभी देखा सोचा भुला दिया या भूल गया पर गाँठ गाँठ बनी रही। तीनों गाँठ सालों से अपनी जगह गहरे बैठे थे बड़ी हिम्मत बड़ा धैर्य बड़ी कोशिश बड़ी पहल की ज़रूरत थी। कई ने छोड़ दी मैंने कोशिश की पहले तो समझा ही नहीं, तीनों गाँठ गहरे बैठे थे। नाखून के सिरे से कोशिश पर कोशिश करने लगा गाँठ गाँठ ठहरा! इसे बने साल बीते थे आसान क्यों था खुलना? मैंने सोच लिया था, कोशिश करूँगा पहल मेरा ही पहले सही। कुछ देखे देखने दो। कुछ सोचे सोचने दो। फिर से नाखून का ज़ोर! एक बार फिर से और ...








