सुबह हो गयी थी
मुझे इस घर को छोड़ते,
मोह लग रहा था!
वहाँ!
ड्यूटी पर भी जाना था,
छुट्टी भी ख़तम और समय!
सब ध्यान में रखा
घर को फिर से वृत्ताकार देखा
फिर भी कुछ छूट गया
अंधेरा ग़ायब होने लगा था
सूरज अंधेरे में कहीं प्रकट होने की ताक में था,
अंततः निकल पड़ा
फिर से आने के लिए
फिर से जाने के लिए।
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