उससे मिला



 साल डेढ़ साल हो गया, 

जब कैंपस में था 

तब उसका पता था 

उसकी सेवा की

 उसे पुचकारा, खिलाया, पिलाया 

फिर एक दिन 

वो कैंपस छोड़ गया 

कैंपस के तीन सौ छिहत्तर बंदर, 

उससे खौफ़ खाते थे! 

 फिर नये लोग आये 

उसे कुत्ता पसंद नहीं था 

और वो मुझे पसंद नहीं था 

खैर! 

आज भी बस स्टैंड पर

 कुछ कुत्तों को बिस्कुट खिला रहा था  

दिल शायद उसे बुला रहा था 

हैरत, वह दौड़ कर आया 

और जाने लगा 

मैंने उसे आवाज़ दी 

और दौड़ कर आ गया 

फिर पुचकारा, दुलार किया 

लोग देखते रहे 

उससे कहा खाओ 

नहीं खाया

मुँह में खिलाया, नहीं खाया। 

वजह जो भी हो

 वह पहले जैसे ही शक्तिशाली था

 कैंपस में मैं उसे 'लायन' बुलाता था 

उसके पापा को प्यार से 'चार्ली'

पास के कुत्तों पर उसने धाक जमाया 

और एक दिशा में चला गया। 

मैं भी देखता रहा-

उसे मजबूत! उसे खुश! 

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