रंग रंगविहीन
आज तो बड़ी जल्दी में था
ड्यूटी पर सवा सात में पहुँचना था
जल्दी में सेब को,
दातों से काटा।
कभी गोलाई में
और फिर,
जैसे जे सी बी मशीन!
किसी जगह की मिट्टी को।
जल्दी के कटाव में
कुछ टुकड़े गिरे
ज़मीन पर,
जैसे ज़मीन के लिए।
मुँह से लाख संभाले, न संभला!
मैं चला गया था।
मगर इस बार के लौटने में
मेरे पाँव तेज गति को भूले थे
उसी जगह पर आ पहुँचा
जहाँ से जल्दी में गुजरा था
वर्तमान उस अतीत से अलग था
उस पथरीली, धूमिल जगह पर;
मानो कि मेला था!
छोटी चींटी
मध्यम चींटी
बड़ी चींटी
काली चींटी
लाल चींटी
मोटी चींटी
दुबली चींटी, सब थे,
सब उस टुकड़े को ले जा रहे थे
कुछ वहीं पर मिलकर घेरा में खा रहे थे
कितनी शांति थी!
कितना नयापन, अपनापन था।
उसी धरती पर,
जहाँ शांति के ऊपर सहस्रों प्रहार थे
उसी मानव विशेष द्वारा,
जिसके द्वारा शांति संदेश की, उम्मीद की गयी थी।
आदर से मैं झुक गया,
किसी नें स्वागत में खाना छोड़ दिया
और अतिथि को देखने लगा
पहचानने की कोशिश करने लगा
उसकी आँखों में चमक थी
शांति की, संतुष्टि की, ठहराव की, उस पराव की,
फिर से उस आस की
जिसे मैंने जगा दिया था
'क्या यह मेला आशांति के दूतों को भी सिखाएगा?'
कुछ पल सोचा!
और फिर चल दिया
फिर किसी सोच में पड़ने के लिए!



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