फिर आज

 


फिर, आज टूटा था एक दिल 

घायल हुई थी एक आत्मा

टूटे थे ख़्वाब कोई 

नहीं संभला था, 

भावनाओं का एक वेग। 

वह मासूम थी 

ग्यारह बारह की 

कद तीन या चार का 

शरीर पर, 

किसी मध्यम परिवार का कपड़ा

 उसकी आँखों से, 

 दुःखी दैदीप्य मोती बहे जा रहे थे 

 बस स्टैंड पर लोग थे 

पर उसमें सबसे अलग, 

सिर्फ वो रो रही थी 

और लोग, उसके रोने को नहीं जानते थे! 

मैं दोनों को जानता था 

पर मैं कुछ नहीं! 

 मेरी बस, स्टैंड पर आयी 

और क्षण बाद ही चल दी

 खिड़की से, 

 मैं बस यही देख पाया! 

मैं कारण नहीं जानता था

 उसे जानता था 

उसके एहसास को जानता था 

उसे नहीं जानता था। 

किसी बात ने तोड़ा था उसे

या किसी को भूल बैठी थी 

या किसी ने भुला दिया था 

या उसका कुछ खो गया था

या किसी ने उसे खो दिया था! 

फिर आज टूटा था एक दिल 

घायल हुई थी एक आत्मा 

टूटे थे ख़्वाब कोई 

नहीं संभला था भावनाओं का एक वेग! 

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