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ग़ज़ल

गाँठ रस्सी की

अभी तो चलना है

आंगन की रस्सी

चाह

चालीस का चप्पल

शोर करना था

यहाँ वहाँ

तुम मान चुके हो

वे अभी आये हैं... ग़ज़ल