रास्ते का पत्ता



आज सवेरे 
साढ़े चार पांच बजे जाग गया था 
कहीं दूसरी जगह 
दूसरे शहर जाना था
 सोचा थोड़ी वर्जिश सही 
और चहलकदमी करने लगा 
सड़क वही थी कई साल पुरानी 
मगर मजबूत। 
अब उसके सीमेंट 
जुदा होने लगे थे 
जिसका इल्ज़ाम 
मैं सूरज और बारिश को दूंगा। 
कंकड़ बाहर झांक रहे थे 
उसी अलसाए 
गिरे परे दो सूखे पत्ते 
मेरे पाँव के नीचे आ गए 
वे चीख उठे! 
इतनी सवेरे की शांति में कोलाहल! 
मैं फ़ौरन नीचे झुका 
मेरे झुकने में झुकना नहीं था 
विनम्रता थी। 
आदर था। 
उस मृत पत्ते के लिए, 
संस्कार भी मेरे लिए 
मैंने उठाया उसे 
बड़े अदब से 
और हमेशा के लिए, 
उस रास्ते को 
शांति दान दिया।
कम से कम तब तक 
जब तक मैं वहाँ मुस्तैद,
नंगे पाँव टहल रहा था चल रहा था।

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