आने जाने के बीच
कहीं से आया था
फ़िर कहीं जाना था
इस आने में ज़्यादा ठहराव था
बनिस्पत जाने के।
खैर दिमाग़ की उलझन
शरीर की बनी थी
और वही
क्रिया कलाप में आ गयी थी।
थका था,
चाय ज़रूरी समझा
और बातों में भी
सुलझने की कोशिश में उलझा
हल्के चाय को तेजी में पी गया
गंतव्य की बजाय
चाय तालु में जा उलझा
और अपनी प्रकृति से
जला दिया।
प्रकट में
उलट मैं ठंडा हो गया
कुछ पल चुप हो गया
चाय पीना भूल गया।
आना भूल चुका था
जाना दिमाग़ में रहा
ताजे जले हुए;
तालु के ज़ख़्म की तरह।


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