साये में आरामतलब
मैंने अपनी कार को सोच लिया था,
इस शहर में जहाँ!
जलती सड़क और
रंगबिरंगे चमकते मकान ही दिखते थे
वहीं कहीं किसी पेड़!
सायेदार दरख़्त के नीचे लगाउँगा।
अपने ऑफिसर को
किसी काम से छोड़
निकल गया साये के खोज में
कोई डेढ़ कि.मी. निकला
कि एक मन्दिर,
पास में तालाब
एक मैदान,
सड़क किनारे सायेदार दरख़्त।
मेरी खोज!
मेरी चाह!
मेरी हसरत!
मिल गयी।
गाड़ी सुस्ता रही थी।
मैं हवा खा रहा था
तभी उपर दरख़्तों के बीच,
पतली सी डाली पर,
सुस्ता रहे दो काले कौवे पर पड़ी।
दोनों ऊपर-नीचे की डाली पर
मगर करीब थे।
बड़ी शांति थी।
पास से आती गाड़ियों की पीं! पों!
घिसटते चप्पल और जूतों की आवाज़
उसे डरा नहीं पा रहे थे।
उनकी शांति में,
मेरी शांति भी मूर्त रूप ले रही थी।
मैं भी क्षणभर शांत मृदुल हो गया था;
दुत्कार का प्रयाय, काला वर्ण!
शांति, स्थायित्व का प्रतिक बन गया था।



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