सूनेपन में आहट
कल मेरी 3 बजे ट्रेन थी
इसीलिए आज शाम
मैं 5 बजे
बस से निकल गया था
यहाँ विज़ियनगरम स्टेशन पहुँचा
तो गाड़ी कई घंटे लेट थी
मेरी नज़र उन सीट्स पर पड़ी
जिस पर लोग थे
हंस रहे थे
बात कर रहे थे
ठहाका लगा रहे थे
वहीं झूम रहे थे
शायद उनकी ट्रेन
कुछ ही घंटे में थी
उनकी हँसी,
मुझे थोड़ी चुभी
मगर कोई नहीं
अगली सुबह,
फिर आया स्टेशन पर।
गाड़ी फिर भी लेट थी
वो सीट,
जहाँ पर खुशियाँ थीं
ठहाके थे
उनका अपनापन था
सब नदारद था!
वहाँ खामोशी पसरी थी!
बहुत देर के लिए नहीं,
फिर वहाँ कोई न कोई आने ही वाला था
ये प्लेटफॉर्म है !



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