ग़ज़ल
शहर में हल्ला हुआ देखो तो क्या हुआ
बोलो, कोई नाखुश क्या फिर से हुआ
उसे कहा तो था मैंने अपने हद में रहे
फ़िर क्यों वो अपने कद से ऊँचा हुआ
देखो यहाँ वहाँ के सारे सजर कट गए
चाहे जो भी बाकोशिश उससे बड़ा हुआ
फ़ैसला ही था तेरा तो जी लेते ज़िंदगी
फिर क्यों अफ़सोस तुझे ज़िंदगी पर हुआ
अब जब लगाई शर्त तो जीतना ही होगा
क्यों सोचें कि कितने जंग मे फ़तेह हुआ
शाम ढली थी तो अंधेरा भी हो गया 'सहर्ष'
रात के आगोश में अब क्यों देखो सहर हुआ



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