एक शाम


 

एक शाम, शाम ढल रही थी 

मैं भी रुक गया था, ठहर गया था, 

हाँ थोड़ा थम गया था 

थोड़ा झुक गया था

 थोड़ा सोच रहा था

 कुछ समझ रहा था 

बीते दिन गिन रहा था 

आने वाले को सोच रहा था 

मैं अकेला नहीं था, 

 मेरे साथ मेरी तन्हाई थी। 

मैं, 

अब ज़रा खामोश था 

हाँ कहीं खोया था

 इसी दरमियाँ, 

एक पत्ता, 

पेड़ से गिरा

 सीधे मेरे सर 

फिर धर पर 

और फिर ज़मीन पर

 वो गिरा, 

थोड़ा हिला

 और फिर हिल न सका

मैंने पूछा- 

क्या कोई और भी है? 

हाँ, 

है देखो, 

 कुछ ऊपर टँगे हुए 

कुछ तेरे पाँव के नीचे मिट्टी बने हुए।

 तो क्या ये सब गिर जाएँगे? 

हाँ कुछ आज

 कुछ कल

 कुछ परसों 

और कुछ, कुछ दिन बाद। 

लेकिन हाँ! एक दिन सब। 

तो क्या ये दरख़्त सूना हो जाएगा? 

नहीं

 नये पत्ते फिर आएंगे 

फिर से लटकने के लिए

 फिर से गिरने के लिए 

फिर से मरने के लिए। 

आवृति की आवृति होती रहेगी, 

जब तक है सृष्टि, 

सृष्टि के बाद भी सृष्टि होगी 

आवृति की आवृति के लिए। 


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