बेबस बेबसी



 बस में सब उम्र के लोग थे 

उनमें कुछ न था मेरे लिए 

मेरी नज़र पड़ी कई किलोमीटर के बाद, 

 जब वो आये

 बस में दोनों थे- बूढ़े 

करीब साठ से उपर 

पति की एक आँख उजली थी, 

पर उसपर शानदार पारदर्शी चश्मा था 

पत्नी थोड़ी लंगड़ाकर चल रही थी 

पाँव में अच्छी काली चप्पल थी 

सामान चार था, 

सब उसी पति के दम था। 

बड़े संभल कर चढ़ाया उसे 

फिर बिठाया उसे 

उसे भी शायद आदत थी इसकी 

उसका कंधा पकड़कर बैठी सीट पर 

वह अब भी बहुत फुर्तीला था 

श्याद उसकी प्रशिक्षण ही ऐसी थी, 

और उसकी वैसी थी ! 

वह कई बार फोन मिलाया, 

 बात किया, 

 वो बस बैठी रही! 

कई बार ठिकाने का मुआयना किया

 और फिर बैठा। 

मगर वो बैठी रही! 

उतरते वक़्त भी 

उसे सहारे की ज़रूरत पड़ी 

पहले तो वह सारा समान ले नीचे रख आया, 

फिर सामान सी उस पत्नी को 

बड़े अदब से उतारता रहा 

कई सेकंड लगे 

शायद अदब भी उसे सिखाया गया था 

बस के बाहर भी 

उसने उसका सहारा लिया 

जिसकी वह आदी हो गयी थी- बचपन से?

जवानी से? 

बुढ़ापा से? 

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