आज फिर
आज फिर
उसने तोड़ दी
बेड़ियाँ अपने पाँव की।
कर के सारे काम
चली करने नौकरी
दिहाड़ी,
शाम को आती लौटकर,
फिर से देखती
अपने बच्चों और
पति को।
गाड़ी में बैठने
को थी,
पीछे से दहाड़ा पति
उसने सुनी न एक,
और चल दी गाड़ी की तरफ़।
सुबह का वक़्त
लोग सब
चाय की दुकान पर,
देखते रहे तमाशा।
पति हारा,
लगा चाय पीने
अपना सिर झुकाए।
सोचकर वो लाएगी,
कुछ पैसे कमाकर
उसी के लिए,
उसी के बच्चे के लिए।
देखी एक बार,
वो भी पीछे,
और चल दी,
उम्मीदों के संग
अपने चाहत के संग
अपने अरमानों के संग
अपने ज़िम्मेदारी के संग।



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