जब अंधेरे ने दी आवाज़

 

दुनियाँ से उकताया

यूँ ही फिर रहा था,

इधर उधर, न जाने किधर।

अपने में खोया,

बस खुद से की बातें।

कई बार पहुँचा

कई बार फिर लौटा।

करता रहा सफ़र

बार बार

बिना मंज़िल के

फिर स्याह ख़ामोशी

बोल पड़ी-

"न भटक,

देख मैं भी क्षणिक

वो आता होगा,

मुझे मिटाने,

तू अब मत भटक

देख कहीं तेरी मंज़िल

तुझे बुलाती।"

कह कर गुम हुआ

पूरा अंधेरा।

मन में था उजाला।

बाहर चमक थी,

सुबह हो गयी।

मेरा अंधेरा,

जा चुका था,

देके मुझे हिम्मत,

लौटा के मेरी ताक़त।


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