ग़ज़ल
ये सफ़ेद झूठ बोलते हैं
मनमर्ज़ी ज़ुबान बोलते हैं
आपको हमें रखकर अंधरे में
हमारा मन बहलाते हैं
होती है जब उनकी ज़रूरत
एक एक गिरह खोलते हैं
ये तो रहते ख़ामोश यूँ
मगर आँखों से तौलते हैं
I see I think I mix I prepare and I make them appear in purified form that I call -POEM
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