पत्थर के फूल

 बरसों से देखा है

इस मंजीरा नदी को

और इसका बहता पानी।

समय बीता

शेष इसकी निशानी।

दोनों बाहों में पत्थर

भर भर के पूरा

पानी के बिना

ग्राम्य जीवन अधूरा।

मगर आस जो थोड़ी बाकी

निकल आये कुछ घास

मिली होगी कहीं नमीं

ये खिलने का मौसम खास।

नयनों को मिले सुख

नदी ने पत्थर में नमी दी

खिले हैं फूल चहुँ ओर

मुस्कुराओ, भला क्या कमी दी?

Comments

Popular Posts