ग़ज़ल

 वो हमसे बड़े हैं क्या कहें

किस्मत यही चुपचाप सहें

एक के बाद एक ज़ुल्म

बस हम सहते रहें

होगी सुब्ह एक दिन मेरी भी

बस यही कहते रहें

ठिकाना था एक मेरा 'सहर्ष'

हुए बेघर, अब कहाँ रहें

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