ग़ज़ल
अब नए ढंग के हैं लोग
सब चालाक,बेईमान हैं लोग
बताओ इन्हें, समझाएंगे तुम्हें
कितने बड़े हैं लोग
लिया जो किया इकट्ठा बेकार
क्यों नहीं समझते हैं लोग
दौलत, शोहरत फिर ख़ामोशी
फिर कहीं खो जाएंगे लोग
अभी से संभलना है, संभालो 'सहर्ष'
दगेबाज़ हैं, हमें बिगाड़ देंगे लोग


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