ख़ुशबू सी हो तुम बिखर क्यों नहीं जाती
बिना आईना के संवर क्यों नहीं जाती
हमने तो यूँ कोशिश बहुतेरे किये
यादों से तुम चली क्यों नहीं जाती
हाथ में तो हैं यूँ मेरे भी कई लकीरें
किस्मत मेरी बदल क्यों नहीं जाती
ला दूँ सुबूत-ए-वफ़ा तब मानोगी
तुम ख़ुद से समझ क्यों नहीं जाती
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