सूखी नदी







सूखी थी नदी कब से

पत्थर भी सिर ऊपर करने लगे

कल के हरे घास

लगे थे मुरझाने लगे

किनारों पर पानी का दरस नहीं

थे हाहाकार मचाने लगे

उड़ते पंछियों का आस था उजड़ा

थे मुँह फेर जाने लगे

कछुए केकड़े मछली सब के सब

थे ग़ायब होने लगे

मगर रुत बदली अचानक

पत्थर डूब गए सिर तलक

फिर से सब अपने जगह लौटने लगे

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