यहाँ वहाँ
दशहरा का मेला था, पूरे शहर में शोर था
उससे ज़्यादा कमाऊँ, दुकानों में होड़ था
दोनों, चारों सड़कों पर भी लगी भीड़ थी
धरती में आ चुभी मानो आदम तीर थी
शहर के पास के दुकानदार, आये लगाने मेला
शाम से सुबह, सुबह से शाम होना था खेला
एक बुढ़िया भी अपने छः की पोती के साथ, थी आयी
ले जाऊंगी कुछ कमाकर घर, साथ अपने आस थी लाई
लोगों की भीड़ आती, जाती देख, खिला बूढ़ा मन भी
अपने टोकरी को रखा नीचे संभाला बूढ़ा तन भी
सब दुकान चहक रहे थे, लोग महक रहे थे
जो थे युवा, और होते जवान, भीड़ में बहक रहे थे
वह थी एक आस लगायी, आते जाते लोगों पर
जो रुकते थे चमक पर, रोशन पर, ऊँची दुकान पर
ग्लानि भाव लिए मानो सिमटी थी, सड़क के छोर पर, अंधेरे में
जहाँ शांति थी, कोलाहल न था, कौन आता उस अंधेरे में
कभी अपने मुरही झिलिया को, तो कभी कचड़ी को सहलाती
आयेंगे लोग इस अंधेरे में भी, जिसे चाह, ऐसे मन को सहलाती
पास में लोग कदमों की दूरी पर बने भंवरे थे, उनकी भीड़ थी
दुकानदार खुश भी परेशां था, पैसे गिनने की फुर्सत न थी, भीड़ थी
यहाँ उसका बटुआ खाली शीत का मारा था, कोई बरकत न थी
एक आह थी, कसक थी, सुनापन था, सब गैर थे, अनजानापन था
किससे कहे, कौन सुने, दिल में पूरा, सारा, समूचा खा़लीपन था
मुरही की ऊँचाई, कचड़ी की जगह, झिलिया की चमक में अंतर न था
बुला लेती किसी ग्राहक को अपने अंधेरे दुकान में, ऐसा मंतर न था
क्या लोग चमक देखते हैं?
चीज़ नहीं?
***
दशहरे के मेले की मार्मिक अंतःकथा: उपभोक्तावाद और मानवीय उपेक्षा का जीवंत दस्तावेज
सुभाष श्याम सहर्ष की यह कविता ‘दशहरा का मेला था, पूरे शहर में शोर था’ पारंपरिक उत्सवधर्मिता की चमक-दमक के बरक्स समाज के उस हाशिए के सच को उद्घाटित करती है, जो महानगरों और कस्बों के मेलों में उत्सव के शोर के बीच पूरी तरह अनसुना रह जाता है। कविता का कैनवास भले ही एक स्थानीय मेले का है, किंतु इसका धरातल सार्वभौमिक और कालजयी है।
साहित्यिक टिप्पणी: देश और विश्व साहित्य पटल के संदर्भ में
यह कविता आधुनिक विश्व साहित्य और भारतीय यथार्थवाद के उस प्रगतिशील और मानवतावादी विमर्श से सीधे जुड़ती है, जो चार्ल्स डिकेंस के उपन्यासों या मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘ईदगाह’ की याद दिलाता है। जिस प्रकार प्रेमचंद की ‘ईदगाह’ में हामिद का चरित्र मेले की चकाचौंध के बीच एक बाल-मन की सामाजिक विडंबना को उजागर करता है, उसी प्रकार सहर्ष की यह कविता एक असहाय वृद्ध महिला के माध्यम से पूँजीवादी उत्सव संस्कृति के क्रूर यथार्थ को सामने लाती है।
विश्व साहित्य के पटल पर, बर्टोल्ट ब्रेख्त की कविताओं या मैक्सिम गोर्की के यथार्थवाद की भांति यह रचना भी व्यवस्था की विसंगतियों पर करारा व्यंग्य करती है। मेला जहाँ एक ओर उल्लास, उपभोक्तावादी होड़ और व्यावसायिक चंचलता का प्रतीक है—“उससे ज़्यादा कमाऊँ, दुकानों में होड़ था”—वहीं दूसरी ओर यह सामाजिक असमानता का सबसे बड़ा अखाड़ा बन जाता है। सड़क के उजाले और छोर के अंधेरे का यह द्वंद्व हिंदी कविता में केदारनाथ अग्रवाल या नागार्जुन की लोकधर्मी और जनपक्षीय काव्य-परंपरा की याद दिलाता है, जहाँ श्रम और अभाव हाशिए पर धकेल दिए जाते हैं।
कवि का लेखन विश्लेषण
सुभाष श्याम सहर्ष की लेखन शैली की सबसे बड़ी विशेषता उनकी भाषा की सहजता, बिंब-विधान की सटीकता और संवेदना की गहराई है। इस कविता में उन्होंने शिल्प और कथ्य का अनूठा सामंजस्य बिठाया है:
* मार्मिक बिंब-विधान: कवि ने दृश्य और स्पर्शनीय बिंबों का अद्भुत प्रयोग किया है। “धरती में आ चुभी मानो आदम तीर थी” जैसी पंक्तियां भीड़ के भारीपन और मानवीय असहजता को अत्यंत जीवंत कर देती हैं। इसके विपरीत, मुरही, झिलिया और कचड़ी जैसे स्थानीय व्यंजनों के उल्लेख से ग्रामीण-कस्बाई जीवन की सोंधी महक सीधे पाठकों के मन में उतरती है।
* मनोवैज्ञानिक यथार्थ: बुढ़िया की मानसिक स्थिति—“ग्लानि भाव लिए मानो सिमटी थी, सड़क के छोर पर, अंधेरे में”—सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था की पीड़ा है जो गरीब को उसकी आजीविका के साथ अंधेरे में धकेल देती है।
* प्रश्नपरक समापन: कविता का अंत एक तीखे दार्शनिक और आत्मपरक प्रश्न के साथ होता है—
“क्या लोग चमक देखते हैं? / चीज़ नहीं?”
यह प्रश्न आधुनिक उपभोक्ता समाज की उस मानसिकता पर सीधा प्रहार है जो गुणवत्ता या मानवीय श्रम के सम्मान के बजाय केवल चमकदार आवरण और ब्रांड को प्राथमिकता देती है।
निष्कर्ष
संक्षेप में कहा जाए तो यह कविता केवल एक बूढ़ी महिला और उसकी मुरही-कचड़ी की बिक्री की दास्तान नहीं है, बल्कि यह उत्सवों की चकाचौंध के पीछे छिपी हुई सामाजिक संवेदनहीनता का एक दस्तावेज़ है। सुभाष श्याम सहर्ष ने अपनी सादगीभरी शब्दावली और पैनी दृष्टि से लोक-जीवन के इस अनछुए पहलू को वैश्विक साहित्यिक ऊंचाइयों तक पहुँचाया है, जो पाठक को भीतर तक झकझोर कर रख देता है।



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