क्या सोचा?
क्या सोचा आपने
ज़िंदगी ऐसे ही चलेगी
हंसी खुशी में ढलती रहेगी
आप गायेंगे गाना
ज़िंदगी चहकेगी।
हमेशा हवा ताजी
खुशबू सी आकर बहेगी।
सुबह होगी
शाम होगी
ज़िंदगी आराम करेगी।
नाम शोहरत
पैसा ताक़त
सब तेरे नाम करेगी!
नहीं!
नहीं!
देखो उस ऊँचे पहाड़ की ढलान को
घर के बासी बनते मेहमान को।
मेहनत में टूटे
फिर बनते आसान को।
किसी तन्हा पराये का
बनता अपना जहान को।
बहती नदी की धार
फिर उसके मंथर आधार को।
घोड़ा पर उड़ते
फिर नीचे गिरे सवार को।
धूप में जलती धरती
फिर चांदनी की ठंढक में अलसायी ज़मीन को।
कल बिना पत्ती बिना फूल
आज फूलों से लदे पेड़ को।
क्या सोचा आपने
आज ऊँचाई है
कल ढलान तय है!
देखो समय चक्र
चल रहा है
सूरज निकल रहा है
दिन ढल रहा है।
क्या सोचा आपने
ज़िंदगी ऐसे ही चलेगी
हंसी खुशी में ढलती रहेगी
आप गायेंगे गाना
ज़िंदगी चहकेगी
नहीं!
बिल्कुल नहीं!
***
यह कविता जीवन के सुख-दुःख के चक्र और अनिश्चितता का अत्यंत सजीव व दार्शनिक चित्रण करती है।
इस रचना से जुड़ी मुख्य बातें इस प्रकार हैं:
* विरोधाभास और यथार्थ का सुंदर मेल: कविता के पहले हिस्से में जीवन के सहज, सुखी और आरामदायक पहलुओं की कल्पना की गई है, तो दूसरे हिस्से में "नहीं! बिल्कुल नहीं!" कहकर जीवन के कड़े संघर्ष, उतार-चढ़ाव और परिवर्तनशीलता को सामने लाया गया है।
* प्रकृति के प्रतीकों का प्रभावी प्रयोग: पहाड़ की ढलान, बहती नदी, धूप में जलती धरती और चांदनी, तथा पतझड़ के बाद फूलों से लदे पेड़ जैसे बिंब समय की निरंतरता और जीवन के बदलते रूपों को गहराई से दर्शाते हैं।
* कालजयी संदेश: यह रचना यह संदेश देती है कि सफलता और ऊँचाइयाँ स्थायी नहीं होतीं, और ना ही दुःख हमेशा रहता है; समय चक्र निरंतर चलता रहता है और जीवन में हर स्थिति बदलती है।
सुभाष श्याम सहर्ष की यह कविता केवल एक व्यक्तिगत अनुभूति नहीं, बल्कि वैश्विक फलक पर मानव जीवन, समय और प्रकृति के शाश्वत सत्य को छूने वाली एक गहन दार्शनिक रचना है। जब हम इस कविता की तुलना देश और विश्व स्तर के साहित्य से करते हैं, तो इसके अंतर्संबंध हरिवंश राय बच्चन की कालजयी रचना ‘मधुशाला’ के जीवन-दर्शन, सुमित्रानंदन पंत की प्रकृति-चेतना और पाश्चात्य साहित्य में पर्सी बिशी शेली (Percy Bysshe Shelley) तथा राबर्ट फ्रॉस्ट (Robert Frost) की कविताओं से जुड़ते दिखाई देते हैं।
कविता का आरंभ सुख, वैभव और नाम-शोहरत की अंधी दौड़ के यथार्थ पर व्यंग्य करता है। यह दृष्टिकोण हरिवंश राय बच्चन की उस शैली की याद दिलाता है जहाँ वे जीवन के संघर्षों और क्षणभंगुरता को सहजता से पिरोते हैं। कविता में "नहीं! बिल्कुल नहीं!" का उद्गार आधुनिक हिंदी कविता के उस तेवर का प्रतिनिधित्व करता है जहाँ कवि रूढ़िवादी आशावाद को खारिज कर यथार्थवादी संघर्ष को अपनाता है। यह मुक्तिबोध और नागार्जुन की यथार्थवादी दृष्टि के निकट ठहरता है, जो जीवन की चमक-दमक के पीछे छिपे श्रम और पसीने को पहचानते हैं।
विश्व साहित्य के संदर्भ में, इस कविता की तुलना रोबर्ट फ्रॉस्ट की प्रसिद्ध कविताओं और शेली की प्रसिद्ध रचना ‘ओड टू द वेस्ट विंड’ (Ode to the West Wind) से की जा सकती है। शेली की तरह यहाँ भी प्रकृति के माध्यम से यह संदेश दिया गया है—"यदि सर्दी आती है, तो क्या वसंत पीछे रह सकता है?" सहर्ष की कविता में ‘कल बिना पत्ती बिना फूल / आज फूलों से लदे पेड़ को’ देखना और ‘धूप में जलती धरती / फिर चांदनी की ठंडक में अलसायी ज़मीन’ का बिंब शेली और जॉन कीट्स के प्राकृतिक सौंदर्य और चक्रात्मक परिवर्तन की याद दिलाता है। फ्रॉस्ट की कविताओं की तरह यहाँ भी जीवन के थका देने वाले सफर, ढलान और पगडंडियों को पार करने का मौन संदेश है, जहाँ ‘घोड़ा पर उड़ते / फिर नीचे गिरे सवार को’ देखकर मनुष्य को अहंकार त्यागने की सीख मिलती है।
भारतीय साहित्यिक परंपरा में तुलसीदास और कबीर के यहाँ भी जीवन के उतार-चढ़ाव (सुख-दुःख धूप-छाँव की तरह) को समय चक्र का अभिन्न अंग माना गया है। सहर्ष ने आधुनिक संदर्भ में उसी प्राचीन भारतीय दर्शन ‘कालचक्र’ को पुनर्जीवित किया है। जहाँ पाश्चात्य अस्तित्ववादी (Existentialist) साहित्यकार जीवन की अनिश्चितता को निराशा और अकेलेपन से जोड़ते हैं, वहीं यह कविता निराशावादी नहीं बनती। यह मानती है कि ढलान के बाद ही नई ऊँचाइयों का सफर तय होता है।
अंततः, यह कविता हिंदी साहित्य की उस धारा को समृद्ध करती है जो साधारण शब्दों में असाधारण दार्शनिक प्रश्न खड़े करती है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तरों पर यह रचना मानव मन को उसके अहंकार से मुक्त कर प्रकृति के शाश्वत नियमों और श्रम की महिमा के प्रति समर्पित होने का संदेश देती है।



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