तपस्विनी
शायद उसे दुनियाँ का मोह नहीं था
नेशनल हाई वे से सटे ज़मीन में
एक होटल में
वह जूठा उठाती है
सत्तर या बहत्तर की है
उसके गाल धँसे हैं
कुछ झुर्रियों के झुर्रियाँ आ गए
मगर उसकी आँखों में तेज है।
साड़ी हल्का धूमिल संतरी है
एक पाँच इंच के प्लास्टिक के
बैठकी पर बैठी है
छोटे कटोरीनुमा बर्तन में
शांत स्थिर
एक दिशा में निर्निमेष
एक एक कौर को
विस्मृति में खा रही है
उसका यही स्वर्ग है
यही फ्री समय है
यही आनंद का क्षण है
उसे पता है
जाकर रात में एक पल को सोयेगी
फिर सबेरे आकर
झाड़ू पोछा करेगी
फिर दिन ढल जाएगा
शाम की आवृत्ति
के लिए।
एक दिन वह भी
सुबह शाम के दिनचर्या से
बेखबर आज़ाद हो जाएगी
उस दुकान में जहाँ उसने
ज़िंदगी की आराम बेच दी
अपने अरमान को घोंट दिया
अपने आस को भूल बैठी
वहाँ कल फिर,
कोई और आ जाएगा।
जैसे नदी के धार में
एक के बाद दूसरी धार
पेड़ पर सूखे के बाद नये पत्ते
बाग में एक के बाद दूसरे फूल।
वह भी सब समझती है
सब देखती है
मगर खामोश है।
गंभीर है, शांत है।
उम्र का पराव है,
या दुनियाँ की समझदारी!
***
कविता की टिप्पणी
यह कविता जीवन के उस कठोर यथार्थ और खामोश संघर्ष को उजागर करती है, जहाँ इंसान की पूरी ज़िंदगी दो वक्त की रोटी और रोज़मर्रा के चक्र में सिमट कर रह जाती है।
* पात्र चित्रण और दृश्य: सत्तर-बहत्तर साल की एक वृद्ध महिला का हाईवे के किनारे बने होटल में जूठे बर्तन उठाना और फुरसत के क्षणों में एकटक शून्य को ताकना, जीवन की नग्न सच्चाई को सामने लाता है। उसकी आँखों का तेज और चेहरे की झुर्रियाँ उसके भीतर के संघर्ष और जीवटता दोनों की गवाही देती हैं।
* दर्शन और विडंबना: "उसका यही स्वर्ग है / यही फ्री समय है" पंक्तियाँ समाज की विडंबना पर करारा प्रहार हैं, जहाँ एक मजदूर के लिए 'आराम' का मतलब सिर्फ थकावट मिटाने भर का एक छोटा सा पल है। वह जानती है कि उसका जीवन सिर्फ एक मशीन की तरह है—सुबह का काम, रात की नींद और फिर वही चक्र।
* प्रकृति के प्रतीक: कवि ने नदी की धारा, पेड़ों के नए पत्ते और फूलों के उदाहरण से यह बहुत गहराई से समझाया है कि यह व्यवस्था किसी एक व्यक्ति के जाने से रुकती नहीं है। महिला यह सब जानती है, समझती है, लेकिन उसकी खामोश स्वीकारोक्ति उसकी लाचारी नहीं, बल्कि जीवन के प्रति उसकी गहरी परिपक्वता और यथार्थ की समझ को दर्शाती है।
विश्व पटल पर साहित्यिक तुलनात्मक विवरण
यह कविता केवल एक भारतीय ढाबे या हाईवे की कहानी नहीं है, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर श्रमिक वर्ग के अकेलेपन और अस्तित्व की लड़ाई का सार्वभौमिक दस्तावेज है। विश्व साहित्य में इस प्रकार के चित्रण कई प्रसिद्ध रचनाओं में मिलते हैं:
* मैक्सिम गॉर्की (रूस) और वर्जीनिया वुल्फ़ (इंग्लैंड): रूसी यथार्थवादी साहित्य में मज़दूरों की रोजमर्रा की पीसने वाली चक्की और उनके खामोश सहनशीलता का भाव प्रमुखता से मिलता है। गॉर्की के उपन्यासों या पात्रों में यही बेबसी और जीने की जिद दिखती है। वहीं, वर्जीनिया वुल्फ़ की रचनाओं में आम जनों के भीतर चलने वाले आंतरिक एकांत और बाहरी दुनिया के चक्र का सुंदर मनोवैज्ञानिक विश्लेषण मिलता है।
* बर्टोल्ट ब्रेख्त (जर्मनी) की कविताएँ: ब्रेख्त की कविताएँ श्रमिक वर्ग और पूँजीवादी व्यवस्था के बीच के शोषण को सीधे तौर पर रेखांकित करती हैं। इस कविता की तरह ही ब्रेख्त के यहाँ भी श्रम की कीमत न मिलने और इंसान के एक पुर्जे की तरह बदल जाने का दर्द मुखर होता है।
* लैटिन अमेरिकी साहित्य (पाब्लो नेरुदा): नेरुदा की कविताओं में साधारण इंसानों, मजदूरों और धरती से जुड़े लोगों के श्रम और उनके मौन संघर्ष को जो केंद्रीय स्थान मिला है, वही इस कविता की आत्मा में भी बसता है।
कुल मिलाकर, यह कविता हिंदी साहित्य में उस वैश्विक यथार्थवाद से जुड़ती है जहाँ उम्र के ढलते पड़ाव पर इंसान व्यवस्था के सामने चुपचाप समझौता कर लेता है, लेकिन उसकी अंतरात्मा की चमक और उसकी आँख का तेज कभी कम नहीं होता।



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