क्या होगा मुमकिन कि...गजल
क्या हो मुमकिन कि ये जमीन आसमां हो जाए
मैं तेरा हो जाऊं और तू मेरा मेहमान हो जाए
मुसाफिर को भी हो जाए आसानी यूँ गर
मंज़िल पहले हाथ में रास्ता आसान हो जाए
थामा हाथ दोस्ती का तो कयामत तक साथ
में हो जाऊं गुमनाम मगर तेरी पहचान हो जाए
अब क्या कहें किसको कहें यूँ ज़बाँबंदी में
जिंदगी ही जिंदगी के हाथ में गर अरमान हो जाए
क्या हो कि मिलें दुश्मनों से 'सहर्ष' यार बनें
मुझे यारी मिले रहबरी उसका ईमान हो जाए



Comments
Post a Comment