आख़िर ये नियति



 इस बार पता है- 

घर का सारा काम निपटा दूँगा 

पहले तो रेश्मा को, 

एक जोड़ी कपड़ा, 

बाबूजी को गमछि और लुंगी, 

अपनी वाली को एक पीली साड़ी, 

जसवंत को भी एक हाफ पैंट, 

गाय की एक नई रस्सी, 

किराने वाले का दो सौ उन्तालिस रुपया पचहत्तर पैसा, 

अपने लिए एक चप्पल की जोड़ी -

सब खरीद लूंगा,

 दूध वाले का भी सड़सठ रुपया दे दूंगा।

 ठेकेदार, 

इसबार पंद्रह दिन का हिसाब देगा। 

बोलते बोलते-

जतन ने जतन से तसला उठाया 

रेती उसके सिर से कंधा 

फिर फटे टी शर्ट और लुंगी से नीचे गिरा, 

ऊपर से मिस्त्री का डाँट मिला। 

अरे देख के काम कर न! 

नहीं संभलता तो जा! 

 छोड़ दे काम! 

मालिक की गाली सुनेगा, 

मुझे भी सुनाएगा। 

मिस्त्री की चिढ़, 

उसकी बेबसी, 

दोनो मिले हवा में और 

अलग  हुए जैसे बादल से बून्द। 

ढली शाम पश्चिम में 

छाया जतन के मन में अंधेरा, 

चाह थी उसकी बसी घोंसले से 

ऊपर आस में अटका कहीं मन में कैद स्वप्न सा! 

आज का काम ख़तम 

कल का कल! 

हाथ, मुँह, पैर धोकर 

शरीर के सुकून के लिए, 

आज में पूरे कल के लिए

जला दिया चिलम और लगाया सुट्टा, 

दिमाग सुन्न

 खाली सब कुछ, 

भूला ग़म भूला दुनियाँ। 

दीवाल पर पानी मार कर 

लगा दीवाल से। 

मानो थका था सदियों से। 

चिलम लुढ़का एक तरफ 

फिर रुक गया जैसे जतन! 

ठेकेदार उसे आवाज़ देता रहा, 

उसके हाथ में पैसा 

उसे बुलाता रहा 

वह भी निस्पंद् सुनता रहा।

शाम ढलती रही, 

रात ढलती रही। 

नियति हँसती रही, 

ज़िंदगी कुढ़ती रही। 

***

 यह कविता एक मज़दूर (जतन) की आर्थिक विपन्नता, उसकी मासूम ख़्वाहिशों और मज़दूरी के क्रूर यथार्थ का एक बेहद संवेदनशील और मारक चित्र प्रस्तुत करती है।

​कविता पर प्रमुख दृष्टिकोण व समीक्षात्मक बिंदु:

​आस और यथार्थ का द्वंद्व: कविता की शुरुआत जतन के उन छोटे-छोटे सपनों से होती है, जो उसकी पंद्रह दिन की दिहाड़ी से बंधे हैं। रेश्मा के कपड़े, बाबूजी की लुंगी, पत्नी की पीली साड़ी, किराने का 239.75 रुपये का हिसाब और गाय की रस्सी—ये कोई विलासिता नहीं, बल्कि एक साधारण जीवन की अति-आवश्यक ज़रूरतें हैं। पैस-पैसे (रुपये और पैसे) का सटीक हिसाब यह दिखाता है कि एक आम मज़दूर के लिए हर एक पाई का कितना मोल होता है।

​श्रम का क्रूर वातावरण: तसला उठाने और रेती गिरने पर मिस्त्री की डाँट यह दर्शाती है कि जहाँ एक तरफ़ जतन के मन में अपने परिवार के लिए सुंदर सपने पल रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ़ कार्यस्थल पर अपमान, मानसिक दबाव और बेबसी उसका स्वागत करती है।

​'जतन' नाम की सार्थकता: कवि ने "जतन ने जतन से तसला उठाया" लिखकर नाम और भाव दोनों को बहुत ही खूबसूरती से जोड़ा है। जतन केवल एक नाम नहीं, बल्कि जीवन जीने के लिए किया जा रहा अनवरत 'जतन' (प्रयास) है।

​पलायन और आत्म-विस्मृति (Escapism): काम की थकावट, अपमान और सपनों के बोझ से जब शरीर और मन टूट जाता है, तो चिलम का सुट्टा उसके लिए सुकून नहीं, बल्कि दिमाग को सुन्न करने का एक सहारा बनता है। यह समाज के उस तबके की नियति है जो अपने ग़म और थकान को भूलने के लिए क्षणिक नशे की शरण लेता है।

​निस्पंदता और त्रासदी: कविता का अंत अत्यंत मार्मिक है। जब ठेकेदार पैसे लेकर आवाज़ देता है, तब जतन इतना थक चुका है (या शायद शरीर साथ छोड़ चुका है) कि वह 'निस्पंद' (निश्चेष्ट/बेसुध) पड़ा रहता है। जिस पैसे के लिए उसने दिनभर अपमान और मेहनत सही, उसे पाने की स्थिति में भी वह अब नहीं बचा।

​भाषा और शिल्प: कविता की भाषा सरल, व्यावहारिक और सीधे दिल को छूने वाली है। संवाद और दृश्यबिंब इतने जीवंत हैं कि पाठक जतन की थकान, आँखों का अंधेरा और चिलम के धुएँ के बीच उसकी बेबसी को महसूस कर सकता है।

​यह रचना शोषित मज़दूर वर्ग की उस हकीकत को उकेरती है जहाँ "नियति हँसती रहती है और ज़िंदगी कुढ़ती रहती है।"

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