वह फिर से आया
सड़क से सटे
बाक़ी पेडों की तरह
वह भी खड़ा था-
एक सीध में
एक लाईन में
करीने से
अदब से
शांत
सीधा,
आसमां की तरफ
गर्व से साहसी और ऊँचा
बाक़ी लोगों से आगे।
फिर किसी ने हवाला दिया-
सड़क पर साये का
छाँव का
पथ बाधा का
पथ भ्रम का।
फिर कुछ लोग आए,
देखा और चले गये।
कुछ दिन बाद-
फिर लोग आये और चले गए।
वह ऊँचा साहसी शक्तिशाली पेड़!
बेखबर रहा।
पास के पेडों को ख़बर थी
मगर वो चुप रहे।
एक दिन कुछ लोग आये
उस पेड़ को देखा, फिर मशीन से काट दिया।
उसे छोटा कर दिया।
कल तक जो चिड़ियाँ
वहाँ शान से रहते थे
उसका गुणगान करते थे
आज उसे दुत्कार रहे थे
कोस रहे थे,
जैसे, उसने ही सबका घोसला गिरा दिया था।
जाते-जाते मशीन ने
उसे जड़ से भी थोड़ा हिला दिया था।
उस पेड़ को
जैसे सहजन सा छील दिया था।
देख तमाशा,
पास के पेड़ खुश थे।
उनमें जश्न था
सब खामोश थे।
सूरज कई बार उगा
कई बार डूबा!
वक़्त ने अपना काम किया,
उसके हाल ने भी उसे सुखा दिया,
झुका दिया।
फिर एक दिन-
वह पेड़!
एक छोटा पौधा बनकर
उस कटे शाखा से बाहर आया,
पास के पेड़ों में,
फिर से खामोशी थी,
चुप्पी थी,
जलन थी,
अगन थी,
मगर सब खामोश थे।





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