एक जैसा अलग अलग
एक तरफ जन्म हुआ
कुछ आँसू हैं खुशी के
बगल में, पड़ोस में
आजू बाजू में
थोड़ी खामोशी है
सन्नाटा भी!
कुछ आंखें स्थिर
कुछ चलायमान
कुछ ठिढके तो, कुछ अवाक!
बच्चे से थोड़ी दूर पर
गोयठे का धुआँ।
धुआँ में-
एक अजब गजब सी ख़ुशबू!
दूसरी तरफ- अंतिम यात्रा
सगा और बेगाना दोनों साथ हैं
लाश से थोड़ी दूर- एक तरफ धुआँ है
धुआँ में एक ख़ुशबू है
धुआँ शांत, स्थिर,
ऊपर की तरफ बढ़ रहा है,
कुछ आंखें, उसे अचल घूर रही हैं
निःशब्द जुबान चुप है।
ख़ामोशी में
दूर की चिड़ियाँ भी बोलना भूल चुकी है
आकाश शांत है, प्रकृति अचल सी है।
लोग अवाक हैं।
दोनों एक जैसे हैं अलग अलग!
***
कविता का भावार्थ और समीक्षा
यह कविता जीवन के दो सबसे बड़े और शाश्वत सत्यों—जन्म (शुरुआत) और मृत्यु (अंत)—के बीच के विरोधाभास, समानता और दोनों पलों की खामोशी को बहुत ही मार्मिक ढंग से दर्शाती है। कवि ने दोनों ही परिदृश्यों में जीवन की मूल सच्चाई और संवेदनशीलता को पिरोया है।
मुख्य टिप्पणी * चक्र की एकरूपता: कविता का सबसे मजबूत पक्ष उसका अंत है— "दोनों एक जैसे हैं अलग अलग!" कवि यह समझाना चाहते हैं कि जीवन का प्रारंभ और उसका समापन भले ही दो विपरीत छोर प्रतीत हों, परंतु दोनों ही क्षणों में इंसान अवाक, निःशब्द और प्रकृति के आगे विवश होता है। * धुए का साझा बिंब: दोनों ही दृश्यों में 'धुआँ' और 'खुशबू' एक समान सूत्र का काम करती है। एक तरफ गोबर के उपलों का धुआँ ग्रामीण परिवेश में नए जीवन के स्वागत और ऊर्जा का प्रतीक है, तो दूसरी तरफ चिता का धुआँ उसी जीवन की नश्वरता और उसकी अंतिम यात्रा का गवाह है। * संवेदनशीलता: जन्म के समय जहाँ उम्मीदों की हलचल और आंखें चलायमान होती हैं, वहीं मृत्यु के समय वही आंखें स्थिर और अचल हो जाती हैं। यह कविता जीवन और मृत्यु के इस शाश्वत चक्र को बिना किसी जटिलता के बेहद सहज और प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत करती है।
इस कविता की तुलना महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की प्रसिद्ध कविता 'स्मृति' या विशेष रूप से महादेवी वर्मा अथवा केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं के उस संवेदन से की जा सकती है जहाँ जीवन के यथार्थ, प्रकृति और चक्र को उकेरा गया है। यदि हम वैश्विक पटल पर देखें, तो इसकी गूँज अमेरिकी कवि वाल्ट व्हिटमैन (Walt Whitman) की कविताओं में मिलती है, जो जीवन और मृत्यु को एक ही निरंतरता का हिस्सा मानते थे। निराला की 'स्मृति' या छायावादी/यथार्थवादी दृष्टिकोण से तुलना * जीवन और मृत्यु का सहज सामंजस्य: निराला की कविताओं में जहाँ एक ओर करुणा और जीवन का संघर्ष है, वहीं दूसरी ओर प्रकृति के माध्यम से जीवन-मृत्यु को सहज रूप में स्वीकार करने का भाव दिखता है। जिस प्रकार इस कविता में जन्म और मरण दोनों को एक ही धरातल पर लाकर खड़ा किया गया है— "दोनों एक जैसे हैं अलग अलग!"—वैसा ही दार्शनिक समभाव हमें हिंदी कविता की यथार्थवादी धारा में मिलता है। * ग्रामीण बिंबों का प्रयोग: आपकी इस कविता में 'गोयठे का धुआँ' और 'दूर की चिड़ियाँ' जैसे ठेठ ग्रामीण और प्राकृतिक बिंब उपयोग किए गए हैं। केदारनाथ अग्रवाल या नागार्जुन जैसे कवियों की रचनाओं में भी ग्रामीण भारत की मिट्टी, उपलों के धुएँ और साँस लेती हुई प्रकृति के ऐसे ही सजीव चित्र मिलते हैं, जो जीवन की बुनियादी सच्चाइयों से जुड़े होते हैं। वैश्विक संदर्भ: वाल्ट व्हिटमैन (Walt Whitman) से तुलना अमरीकी कवि वाल्ट व्हिटमैन ने अपनी लंबी कविता 'सॉन्ग ऑफ़ माइसेल्फ' (Song of Myself) में जीवन और मृत्यु को लेकर कुछ ऐसा ही दृष्टिकोण रखा है: > "What do you think has become of the young and old men?" > "And what do you think has become of the women and children?" > They are alive and well somewhere, the smallest sprout shows there is really no death... > * समानता: व्हिटमैन भी यह मानते हैं कि जन्म और मृत्यु कोई विपरीत छोर नहीं हैं, बल्कि यह उसी प्रकृति के दो रूप हैं जहाँ एक तिनका उगना भी जीवन का प्रमाण है और अंत होना भी उसी चक्र का हिस्सा है। * अंतर: जहाँ व्हिटमैन का स्वर दार्शनिक और विस्तीर्ण (expansive) हो जाता है, वहीं आपकी इस कविता का स्वर बेहद संयमित, संक्षिप्त और भारतीय ग्रामीण परिवेश की उस खामोशी में बसा है जहाँ लोग घटनाओं को शब्दों में नहीं, बल्कि मौन आँखों से देखते हैं।



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