तू सुनता तो होगा
तू सुनता तो होगा
मुझे आ कभी देख तो मुझे
कल मैं तुझे
अपने कंधे से पूरी दुनियाँ दिखाता था
आज मैं कैद हूँ
यहाँ इन दीवारों के बीच
हर बेगाने के बीच
ये सब मुझ जैसे ही हैं,
लेकिन
किसी में मैं नहीं
तेरा अक्स नहीं
पड़ा हूँ,
किसी की रहमत पर
किसी के चाह पर।
इन्हें भी,
जवान बेटे पतोहू ने छोड़ा है
यहाँ लाकर,
तो किसी को रिश्ते में
जाने के बहाने,
सुनसान सड़क पर।
तो कभी भरे बाज़ार में, लावारिश!
क्या उम्मीद करूँ कि तू आयेगा?
आखि़र तेरे दिल में
मेरा दिल ही तो धड़कता है!
तुझमें भी तो मैं हूँ!
मैं यहाँ अकेला हूँ!
मेरा दिल करता है,
काश! अपने पोता को देख लेता
उसे गले लगा लेता।
कैसा होगा वो?
काश उससे हाथ मिला लेता!
पता नहीं तू कब आयेगा?
खैर तू आज़ाद है,
अपने पैरों पर खड़ा है,
शान से जी!
मैं भी कुछ दिन का मेहमान हूँ।
हो सके तो आना,
जहाँ तू छोड़ गया था,
मुझे खोजना!
आख़िर तेरा बाप हूँ!
तू सुनता तो होगा!
***
भूमिका (Introduction)
यह कविता एक पिता के ह्रदयविदारक एकाकीपन, उपेक्षा और ढलती उम्र की मर्मस्पर्शी लाचारी को उजागर करती एक अत्यंत भावुक रचना है। जीवन के अंतिम पड़ाव में, वृद्धाश्रम की दीवारों के बीच कैद पिता अपने अतीत की मधुर स्मृतियों—जब वह अपने बेटे को कंधे पर उठाकर दुनिया दिखाता था—और वर्तमान की कड़वी सच्चाई के बीच झूल रहा है। यह कविता मात्र एक व्यक्ति की व्यथा नहीं, बल्कि आधुनिक समाज में बिखरते पारिवारिक मूल्यों, टूटते आत्मीय संबंधों और अपनों द्वारा ही बेगाने कर दिए गए बुजुर्गों की खामोश चीख को स्वर देती है।
मुख्य विश्लेषण बिंदु
* मार्मिक विषमता (Contrast): कविता की शुरुआती पंक्तियाँ ही दिल को छू जाती हैं—जहाँ एक तरफ वो अतीत है जब पिता ने बच्चे को अपने कंधों पर बिठाकर पूरी दुनिया दिखाई थी, और दूसरी तरफ आज का कड़वा सच है जहाँ वही पिता अपनों से दूर वृद्धाश्रम की चार दीवारों में कैद है।
* उम्मीद और तड़प: पिता का दिल हर पल अपने बेटे और पोते की एक झलक पाने को तरस रहा है। उसमें शिकायत से ज्यादा एक मिलने की, गले लगाने की और हाथ मिलाने की गहरी कसक है।
* निःस्वार्थ प्रेम और बड़प्पन: सब कुछ खो देने और ठुकराए जाने के बावजूद पिता का आशीर्वाद और प्यार कम नहीं होता। वह कहते हैं—"खैर तू आज़ाद है, अपने पैरों पर खड़ा है, शान से जी!" यह पंक्तियाँ एक पिता के अनमोल और निःस्वार्थ स्वाभिमान को दर्शाती हैं।
* सामाजिक यथार्थ: कविता केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि समाज के उस कड़वे सच को उजागर करती है जहाँ बुजुर्गों को बेगाना बनाकर छोड़ दिया जाता है।
* संबोधन शैली (Direct Address): कविता की पहली पंक्ति "तू सुनता तो होगा" और अंतिम पंक्ति "आख़िर तेरा बाप हूँ!" सीधे बेटे के दिल को पुकारती है। यह संवाद-शैली पाठक को सीधे उस पिता की बातचीत का हिस्सा बना देती है।
* पीढ़ीगत जुड़ाव की लालसा: पिता सिर्फ बेटे को ही नहीं, बल्कि अपने पोते को देखने, गले लगाने और उससे हाथ मिलाने की चाहत रखता है। यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के बीच टूटते रिश्तों और पोते-पोती के प्रति स्वाभाविक स्नेह को खूबसूरती से उकेरता है।
* अकेलेपन का सामूहिक दर्द: "ये सब मुझ जैसे ही हैं, लेकिन किसी में मैं नहीं, तेरा अक्स नहीं..." पंक्तियाँ यह दिखाती हैं कि वृद्धाश्रम में एक जैसे हालात में घिरे होने के बावजूद, अपनों का अक्स और पहचान न मिलने का खालीपन किसी भी सामूहिक माहौल में खत्म नहीं होता।
* अंतिम समय की वास्तविकता: "मैं भी कुछ दिन का मेहमान हूँ" जैसी पंक्तियाँ जीवन की क्षणभंगुरता और ढलती उम्र की उस सच्चाई को सामने लाती हैं, जहाँ इंसान के पास खोने को सिर्फ वक्त और इंतज़ार ही बचता है।
* उम्मीद और स्वाभिमान का संतुलन: कविता में निराशा और लाचारी के बीच भी एक पिता का स्वाभिमान और मिलने की क्षीण सी उम्मीद ज़िंदा रहती है—"जहाँ तू छोड़ गया था, मुझे खोजना!"—यह पंक्ति पश्चाताप और वापसी का एक आखरी मौका बेटे को देती है।



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