ग़ज़ल मुश्किल थी ज़िंदगी...
मुश्किल ज़िंदगी कोशिशें आसान कर गयी
मदद किया एक का दोस्ती जहान हो गयी
गुर्बत के तो दिन थे फिर तुमसे आ मिले
ज़िंदगी बेमिसाल आदम की शान हो गयी
याद है मुझे तुम थे मुझ पर भी मेहरबान
फिर जिस्त मेरी भी एक एहसान हो गयी
बाज़ार से लाया था सारा सरो-सामान घर
लोग आये घर उजड़ा घर दुकान हो गयी
उसे तो दिया था दो टुकड़ा निवाला का
ज़िंदगी कुर्बां , आँखें निगहबां हो गयी
बहुत अकड़ थी 'सहर्ष' ज़िंदगी पर मुझे
पल में उजड़ा आशियाँ और मेजबाँ हो गयी



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