धूंध सा सब कुछ



 कल घर का लाडला बेटा, 

फिर ज़िम्मेदार बेटा, 

पति, 

चाचा और 

फिर सामाजिक इंसान! 

बरस बीत गए! 

कल के बच्चे बड़े हुए, 

आश्रित, 

अब मालिक बने। 

वह खुद लाचार, 

शायद उम्र की मार

या ज़िम्मेदारी की बोझ का असर! 

जो 

कभी घर के अंदर

एक ख़ास जगह

की मिल्कियत रखता था! 

आज घर के बाहर, सड़क के किनारे

द्वार पर एक 

फटे चटाई पर

ऊँघती किस्मत के साथ

कोई पुराना कंबल लिए

बैठा है 

लोग सब, बच्चे, 

बूढ़े, उसका हम उम्र भी

जा रहे मेला देखने। 

सड़क पर गाड़ियों, कदमों, बच्चों, 

बड़ों की बातों का हलचल है। 

हलचल में - 

खुशी, उम्मीदें, उन्माद, जोश, 

हंसी, ख़्वाब, चाहत, तस्वीर, 

चमक, इंद्रधनुषी रंग, गर्व, सब है। 

उसके अंदर-

शांति

चुप्पी

दबाव है

आँखों में ठहराव है

आँखों में नमी है

ढरकते आँसू में

क्षोभ है

घृणा है, स्वयं  से, 

सब दृष्टिगोचर है

सब धूंध है

स्मृति वृत्त में

घुमाव है हलचल है 

आशांति है, कोलाहल है

वहाँ-

वह घर का मुखिया है

सब उसकी तरफ 

ताक रहे हैं। 

यहाँ अपनी संतुष्टि है

अपनापन है

समृद्धि है

गर्व है, सुंदर अहंकार है। 

अतीत! 

अतीत शेष है। 

वर्तमान

ही सच है। 

जो अस्विकार्य है। 

सब धूंध है

स्मृति वृत्त में! 



***

कविता का साहित्यिक विश्लेषण एवं समीक्षा


यह कविता मानव जीवन की एक अत्यंत मर्मस्पर्शी, कठोर और कड़वी सच्चाई को उजागर करती है—अवस्था, उपेक्षा और अस्तित्व का संकट। कविता जीवन के उन पड़ावों को रेखांकित करती है जहाँ व्यक्ति कभी अपने परिवार का केंद्र, लाडला बेटा, और सर्वेसर्वा हुआ करता था, किंतु समय के चक्र और जिम्मेदारियों के दबाव में वह हाशिए पर पहुँच जाता है।


1. संरचना और शिल्प (Structure & Form)


मुक्त छंद का प्रयोग: कविता पारंपरिक छंद-बद्धता से मुक्त है, जो इसके भावों की प्रवाहमहिता और गद्य-कवितेय शैली को और अधिक प्रभावी बनाती है। पंक्तियों का छोटा-बड़ा होना मन की उथल-पुथल, बेचैनी और विचारों के बिखराव को सहजता से चित्रित करता है।


प्रतीकात्मकता (Symbolism):


'फटी चटाई' और 'पुराना कंबल': यह बुढ़ापे, गरीबी, लाचारी और सामाजिक तिरस्कार का प्रतीक हैं।


'मेला': यह बाहरी दुनिया की रौनक, उत्सवधर्मिता, उल्लास और उपभोक्तावादी समाज का प्रतीक है, जो स्वार्थी और गतिमान है।


विरोधाभास (Contrast): कविता का सबसे बड़ा शिल्पगत सौंदर्य इसका विरोधाभास है। एक तरफ बाहर मेले का कोलाहल, रंग-बिरंगी दुनिया और लोगों की उमंग है; दूसरी तरफ उस वृद्ध व्यक्ति के भीतर पसरा सन्नाटा, घुटन और गहरी खामोशी है। स्मृति का संसार (जहाँ वह मुखिया था) और वर्तमान का यथार्थ (जहाँ वह अजनबी है) एक तीखा आघात पहुँचाते हैं।


2. भाव पक्ष और मनोवैज्ञानिक गहराई


कविता केवल एक शारीरिक पतन की कहानी नहीं है, बल्कि यह मानसिक और मनोवैज्ञानिक त्रासदी है।


आत्म-घृणा और क्षोभ: जब वह व्यक्ति अपने अतीत के गौरव (घर का मुखिया, सबका आश्रयदाता) और वर्तमान की लाचारी (सड़क किनारे बैठा उपेक्षित इंसान) की तुलना करता है, तो उसकी आँखों के आँसुओं में केवल दुख नहीं, बल्कि स्वयं से घृणा और व्यवस्था पर क्षोभ है।


वर्तमान का अस्वीकार: "वर्तमान ही सच है / जो अस्वीकार्य है"—यह पंक्ति मनुष्य की उस विवशता को दर्शाती है जहाँ वह चाहकर भी अपनी इस टूटी हुई वास्तविकता को बदल नहीं सकता, और अतीत की स्मृतियों के सहारे ही जीने को अभिशप्त है।


अन्य साहित्यिक कृतियों से तुलनात्मक अध्ययन


हिंदी और विश्व साहित्य में वृद्धों की उपेक्षा, अकेलेपन और सामाजिक विघटन को एक प्रमुख विषय के रूप में उठाया गया है। इस कविता की तुलना निम्नलिखित प्रसिद्ध कृतियों से की जा सकती है:


1. अमरकांत की कहानी 'दोपहर का भोजन' और कमलेश्वर की रचनाएँ


तुलना: नई कहानी आंदोलन के दौर में मध्यमवर्गीय परिवारों के भीतर के आर्थिक संकट और वृद्धों/अभिभावकों की बदलती स्थिति पर गहरा प्रकाश डाला गया है। 'दोपहर का भोजन' का मुंशी चंद्रिका प्रसाद हो या इस कविता का मुख्य पात्र, दोनों ही अपने परिवार के लिए जीवनभर पसीना बहाते हैं, लेकिन अंततः उनकी उपयोगिता समाप्त होने पर उन्हें हाशिए पर धकेल दिया जाता है।


अंतर: जहाँ कहानी में परिवार के भीतर का सूक्ष्म यथार्थ चित्रित है, वहीं इस कविता में एक वृद्ध को घर से बाहर 'सड़क के किनारे' लाकर खड़ा कर दिया गया है, जो सामाजिक अलगाव के विमर्श को और तीव्र करता है।


2. दुष्यंत कुमार की गज़लें ("कहाँ तो तय था چراغ... ")


तुलना: दुष्यंत कुमार की शायरी में व्यवस्था के खोखलेपन और आम आदमी की लाचारी का जो स्वर है, वही स्वर इस कविता में भी दिखाई देता है। मेले की चमक-दमक और उत्सव के बीच सड़क के किनारे बैठा हुआ वृद्ध इस बात का प्रतीक है कि विकास और उल्लास के इस दौर में समाज के कई हिस्से पीछे छूट गए हैं।


भाव साम्य: दोनों ही कृतियाँ मनुष्य की गरिमा के छिन जाने और उसकी व्यवस्थागत विवशता पर सवाल उठाती हैं।


3. सुमित्रानंदन पंत या महादेवी वर्मा की करुणा-प्रधान कविताएँ


तुलना: छायावादी काव्य में करुणा और आंतरिक वेदना की प्रधानता रही है। इस कविता का आंतरिक संघर्ष ("शांति / चुप्पी / दबाव है") छायावादी या उत्तर-छायावादी अंतर्मुखी वेदना की याद दिलाता है, किंतु यहाँ भावुकता के साथ-साथ एक कठोर सामाजिक यथार्थ का खुरदरापन भी मौजूद है जो इसे आधुनिक काल के अधिक करीब लाता है।


निष्कर्ष


यह कविता आधुनिक महानगरों और तेज़ी से बदलते पारिवारिक मूल्यों के उस स्याह पक्ष को बेनकाब करती है जहाँ व्यक्ति केवल 'उपयोगिता' (Utility) के आधार पर आंका जाता है। उपयोगिता खत्म होने पर रिश्ते और आत्मीयताएँ किस प्रकार फटी चटाई और पुराने कंबल की तरह कोने में डाल दी जाती हैं—कवि ने इसे बेहद प्रभावशाली ढंग से पिरोया है। यह कविता पाठक को झकझोरती है और समाज से आत्ममंथन की मांग करती है।





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