चाय की दुकान से
मधुरवाड़ा की 10 की चाय
मुझे खासकर
खींच लाती है यहाँ
यहाँ आने से मेरा भी
और कृति का भी भला होता है
दरमियान इसी के
मेरी चाय ख़तम होने को थी
कुछ लोग चाय ले रहे थे
कुछ चाय पी रहे थे
कुछ के हाथ में चाय थी
आँखों में सड़क के लोग थे
और दिल में पता नहीं क्या
कुछ सस्ती कुर्सी पर अकड़ में थे
शायद कुर्सी से बाहर
कुछ धुआँ के छल्ले से
चाय की हर घूँट को
अंदर भेजने की मानो ड्यूटी में था।
कुछ ऐसे जिनकी 10 कमाई न थी
फिर भी शायद शौक!
या आदत!
वो डेली पीने को आते,
कईयों में से एक अलग
एक आदमीं आदमी सा
मेघवर्ण!
हाफ पेंट में दुकान के पास आया
ज़मीन पर इशारे में बात की फिर
आसमां को भी नाराज़ न होने दिया
फिर बिजली सा घूम कर
काउंटर पर
फिर उसके हाथ में
पेपर कप में चाय
और
दूसरे ही क्षण सड़क पर
मदमाते हाथी की तरह,
कभी बाएँ गया
कभी ट्रैफिक को संभाला
फिर उस पार गया
शायद फिर से आने के लिए।
वो जा चुका था
फिर भी वह शेष था स्मृति में!
बिना पैसे की चाय!
बिना लाइन की चाय!



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