यहाँ पानी वहाँ सूखा
कोई सरकारी क्षेत्र है
चारों ओर घेरा है
बीच में कहीं, एक पाइप है
वहाँ से हर दिन
एक...दो...तीन...
एक...दो...तीन...
बूँदें गिरती हैं
और फिर
पानी की छोटी धारा बनती है
ये अलग कि
वह पास में बने
सीमेंट पर फैल जाता है
बह जाता है
धूप में उड़ जाता है
खतम हो जाता है;
जिसमें तीन गोरैया- नहा सकती है
एक कौवा भी नहा सकता है
तीन सौ चीटियाँ भी
प्यास बुझा सकती है
और बहुत कुछ!
राज- रेगिस्तान में
जहाँ सरकार की ही ज़मीं है,
सूखा है
बयांबां है
कुछ घर हैं और कुछ लोग।
वहाँ प्यास में तड़प है
हवा में गर्मी है,
मौसम में तनाव है।
फिर भी लोग यहाँ हैं।
बिना पानी के
बिना आस के
बिना उम्मीद के
क्योंकि वे- हारना नहीं जानते,
अपने होने को जानते हैं।



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