वह बूढ़ा चेहरा



 उसकी उम्र लगभग सत्तर-

 वह एक दुकान की मालकिन है, 

 हाई वे से सटे दस मीटर पर 

उसकी टाट और फूस से बनी

एक दुकान है 

जिसमें हवा जब भी बहती है 

सीटी बजाते गुजरती है। 

हवा के वेग में कुछ गुटखे, 

कुछ खैनी, 

कुछ पान सुपारी 

कुछ मैगी की लड़ियाँ- लहराती हैं 

टकराती हैं, 

किरमिराहट की आवाज़ होती है 

चोकोलेट,  

केक, 

चाय की बिस्किट के 

डब्बे भी हिलते हैं। 

 उसे भी अपने कांपते हाथों से 

संभाल लेती है 

फिर एकटकी से 

साँय साँय करती आती 

गाड़ी के तरफ निर्निमेश् देखती है। 

अक्सर हर सुबह 

अपने पतली सी धुंधली साड़ी में 

ठंढ में काँपती आती है 

तब जब-

 सूरज भी बाहर नहीं झाँका होता है, 

हाई वे पर -

बाढ़ के पहले पानी के धार जैसी 

गाड़ियाँ आती और जाती हैं। 

फिर पूरे दिन के इंतज़ार में 

शाम ढल जाती है

जल्दी से ढलते दोपहर में 

कोई-कोई रुकता है। 

उसकी दिन भर की कमाई 

सौ डेढ़ सौ हो जाती है। 

जल्दबाज़, ढलते 

चार बजे के सूरज के साथ

 वह भी 

अपने दुकान को बढ़ा देती है। 

धीमे धीमे जमा होते कुहरे में 

सूरज के जैसे 

वह भी गाँव के घरों के पीछे 

खो जाती है। 

कल फिर से 

जाने के लिए 

हड्डी को गलाने वाली 

हवा को चीरने के लिए

कल फिर से उगने के लिए

घर से दुकान तक 

हरी घास के चादर पर 

ओस को कुचल कर 

पैरों के गहरे निशान बनाने के लिए। 


***

 यह कविता ग्रामीण भारत की एक बुजुर्ग महिला के अनवरत जीवन-संघर्ष, उसकी अदम्य जिजीविषा और खामोश समर्पण का एक अत्यंत मार्मिक और सजीव चित्र प्रस्तुत करती है।

कविता पर प्रमुख बिंदु:

 * दृश्य और श्रव्य बिंबों का सुंदर संयोजन: कविता में दृश्य बिंब (टाट-फूस की दुकान, पतली धुंधली साड़ी, लहराती मैगी की लड़ियाँ, ओस पर पैरों के निशान) और श्रव्य बिंब (हवा की सीटी, किरमिराहट की आवाज़, गाड़ियों की साँय-साँय) मिलकर पाठक को सीधे उस हाईवे के किनारे खड़ा कर देते हैं।

 * संघर्ष और जिजीविषा (Survival Instinct): सत्तर वर्ष की अवस्था में, जहाँ विश्राम की आवश्यकता होती है, वहाँ वह महिला तड़के ठंड में उठकर ओस की बूंदों को रौंदते हुए अपनी रोज़ी-रोटी के लिए निकलती है। ₹100-150 की मामूली कमाई के बावजूद उसका जीवन से हार न मानना भारतीय ग्रामीण स्त्रियों के भीतर छिपी जीवटता को दर्शाता है।

 * समय और गाड़ियों का रूपक: हाईवे पर "बाढ़ के पानी की धार जैसी" तेज़ी से गुजरती गाड़ियाँ इस भागती-दौड़ती आधुनिक दुनिया का प्रतीक हैं, जो उस बुजुर्ग महिला के ठहराव, इंतज़ार और गरीबी से बेखबर होकर आगे निकल जाती हैं।

 * प्राकृतिक एकात्मकता (Connection with Nature): सूरज के उगने से पहले आना और सूरज के साथ ही गाँव के कुहरे में ओझल हो जाना दर्शाता है कि उसका जीवन प्रकृति के चक्र के साथ पूर्णतः घुला-मिला है।

 * आशावादी एवं सशक्त समापन: कविता की अंतिम पंक्तियाँ—"कल फिर से उगने के लिए... ओस को कुचल कर पैरों के गहरे निशान बनाने के लिए"—केवल दुख का आख्यान नहीं प्रस्तुत करतीं, बल्कि हर रोज़ हार को पछाड़कर नए सिरे से जीवन से भिड़ जाने की अटूट जिजीविषा और संघर्ष की अमिट छाप छोड़ती हैं।


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