ये भी कैसा अंत

 


मैं चल रहा था अंधेरे में 

फिर थोड़े से उजाले में 

और पड़ी नज़र 

कुछ नन्ही चीटियों पर 

जो लदे थे 

एक आधा छिदा खाये छोड़े फेके सेब पर 

जो स्थिर था 

मृत था

 अपने वर्तमान में

 शांत निश्चिंत अडिग अचल 

शायद अपने अतीत में 

खोया बीते अतीत के साथ 

जिसका एक एक कण नोचा जा रहा था 

उसे अपने आप से अलग किया जा रहा था। 

कल इसका भी उदय हुआ था 

उन फूलों से 

पेड़ पर 

सूरज की मधुर किरणों के बीच 

फिर बड़ा हुआ 

जैसे सब हुए, 

बड़े प्यार से उसे नीचे उतारा गया

 फिर डब्बों में बंद कर 

हमेशा के लिए कैद कर दिया, 

अपने छूट गए 

बाकी सब रूठ गए 

वो आज़ाद हवा का झूला 

उस पर पड़ने वाली प्यारी नज़र

चांदनी की ठंढक, 

सूरज की प्यारी गर्मी 

और बारिश की नरमी 

सब, जैसे की दुबली रस्सी टूट गयी! 

 उसे अनंत यात्रा पर भेज दिया गया, 

उसकी मर्ज़ी कौन पूछता! 

उसकी कौन सुनता! 

हमेशा के लिए वह चुप हो गया 

कई हाथों में आया 

फिर कई हाथों से गया भी 

मृत भी, मृत का शोर नहीं, कोई छोर नहीं, 

जगह बदलता रहा 

सबके मन की चली  

वह भी निस्पंद् चलता रहा। 

और एक दिन फिर से मरने के लिए;

एक और किसी के हाथ लग गया, 

नियति या अंत? 

उसने भी आहत किया, 

घायल किया, 

फिर वह तो अपने मर्ज़ी का मालिक! 

उसे कहीं फेंक दिया! 

वह निःशब्द सहता रहा। 

वह स्थिर था, मृत था 

अपने वर्तमान में शांत , निश्चिंत , अडिग , अचल 

शायद अपने अतीत में खोया 

बीते अतीत के साथ 

जिसका एक एक कण नोचा जा रहा था 

उसे अपने आप से अलग किया जा रहा था।

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