जनरल डिब्बा
हाँ जनाब आपने ठीक सुना
ये जनरल डिब्बा है
इसमें जनरल के साथ साथ
कभी खास लोगों को भी
सफर करना पड़ता है
आखिर ये जनरल डिब्बा जो है,
जनरल से खास बने
उस जनरल की पुनः अनुभूति के लिए
या वक़्त की फिर से वही दिशा!
फ़िलवक़्त यहाँ इस जनरल में
बहुत खास है कहने सुनने के लिए
जब हरेक स्टेशन पर गाड़ी
रुकती और चलती है
लोग दोनों आ जाते हैं।
कुछ लंबी दूरी के
कुछ छोटी दूरी के।
कुछ, कुछ पैसे वाले
कुछ बड़े सामर्थ्य वाले,
कुछ दुबले, कुछ पतले
कुछ कम कुछ ज्यादा उमर वाले
सब, सब मिल जाते हैं!
इस छोटी और बड़ी दूरी के बीच।
पहले पहल तो उस सीट के लिए
झगड़ा होता है।
जिस पर कई बैठे और फिर कई बैठेंगे।
सब आये और चले भी गए
फिर भी दंभपूर्ति!
फिर क्षणों के बाद,
सारे शिकवे गिले ख़तम!
थोड़ी दूर ट्रेन आगे बढ़ी
और मुँह फुलाए लोग थोड़े खुले,
फिर चुपचाप हल्की सी हंसी
कभी ख़ामोशी में उतर गए,
रात हुई जब और गहरी!
फिर तो सब अपने विशेषण को भूले
नींद की मार और शरीर की ज़रूरत!
जिसे जहाँ मिली जगह सो गए,
लेट गए,
फैल गए,
खुल गए,
फिर सब एक जैसे,
कौन स्त्री?
कैसा पुरुष?
कौन जवान?
कैसा बूढ़ा?
कहाँ का बच्चा!
नींद एक जैसी,
और सब जनरल!
हाँ जनाब सब जनरल।



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