भीगा भीगा धुआँ



 ढलते शाम के अंधेरे में 

डूबता गाँव। 

 एक तरफ ऊँचे पक्के मकान

 दूसरी तरफ यहीं पर 

कच्ची सड़क से दाएँ 

भीगी फिसलनदार पगडंडी के साथ-साथ 

ग्यारह कदमों के फ़ासले पर 

टाट फूस का एक नहीं तीन घर 

एक आंगन, 

दो दिन की लगातार बारिश में 

नहाया आंगन 

आंगन में भीग चुका चूल्हा

 जिसमें अभी भी जान बाकी है

 उसका रहबर 

उसका हमदम वो बूढ़ी काया है 

अपने दंतहीन मुँह से 

बार बार फूँक मार रही है 

थाली में रखी, 

मिली दो तीन किस्म की चावल 

साथ में एक मुठ्ठी दआल 

और साग के कुछ पत्ते 

सब भीगे सब उदास! 

जलावन भीगा

 चूल्हा भीगा 

हवा भीगी 

चूल्हा कोयले वाली इंजन सी 

जलती बुझ रही है 

मगर हौसला पहाड़ सा अडिग! 

वह भीग रही है 

धुआँ रह-रह कर उठ रहा है 

उधर पेट में आग लगी है

 यहाँ चूल्हे में आग के लिए 

आस लगी है। 

करे तो क्या करे! 

किससे कहे 

कौन किसको सुनता है! 

यह समाज है। 

शक्तिहीन का नहीं 

शक्तिवान का। 

 पराजित का नहीं 

महान का! 

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