खुशबू का अंत



 आज अपना दिन अपनी शाम है

जी लें जिंदगी जितनी बाकी तमाम है

अतर की खुशबू 

खुशबू की खुशबू

जो चाहे लगा लो

कल, 

कल ये सब चमक, 

यह सब दंभ, यह सब अलगाव, 

भेदभाव, ख़तम हो जाएगा। 

नीचे, 

जिसकी चाहत नहीं, जिसकी मांग नहीं 

जिसकी तलाश नहीं, वह खुशबू आयेगी

बात ये अलग वहाँ सब एक जैसा होगा 

किसी कोने में, अंधेरे में 

किसी सतह पर। 

न चमक होगी, न दंभ होगा 

न अलगाव होगा। 


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