संभलते संभालते



मजबूरी की मूर्ति

गरीबी की मिसाल

वह औरत 

दुखी, गरीब और व्यथित औरत

पसीने से लथपथ, 

सबके साथ, 

बैंड बाजे के आगे चल रही है। 

"अरे मुन्ना तू इधर आ 

अरे तू फिर फिसल गया!"

कहती कहती वो अपने सिर पर रखे

लैंप लाइट को भी संभाली

फिर ढीले होते कमर पर साड़ी को कसी

फिर लोक लाज की पहचान, 

अपने घूँघट को। 

फिर सामने और पीछे आती पंक्ति

को भी मिलान किया।

और फिर अपने बच्चे से बातों में 

ख़ुद को समझाती -

गर तू राजकुमार होता! 

फिर क्यों तू

इस गोद में बाएँ से दाएँ होता

सड़क के कीचड़, पास की बदबू

मालिक की दुत्कार

कुछ भी नहीं

कुछ भी नहीं होता! 

सुन भला तू क्यों रोने लगा? 

देख अब ये सफर भी खत्म हो जाएगा

बारात द्वार पहुँच जाएगा

हाथ में फिर पैसा आएगा

अब देख तू रोना बंद कर

मालिक को गुस्सा आएगा

फिर मजूरी से

सारा पैसा कट जाएगा। 

 भात , दाल, चोखा और पापड़ 

तुझे खिलाऊँगी

तू मेरा मुन्ना राजा

मेरा राजकुमार

अच्छा आ जा इधर आ 

देख न लोग कैसे

नाँच रहे हैं

कल तुझे भी तो नाचना है 

हँसना है गाना है। 

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