कचड़े में एकता
कचड़े में एकता
आज कल ही बना
है कचड़े का एक नया ठिकाना
यहां बड़े ठाठ से अपना हाथ और पांव
पसार कर बैठता है कचड़ा
हो क्यों न
हमने उन्हें आज़ादी बख़्शी है।
या उसने हमें आजाद कर दिया
घर का वो सब कोना साफ है
जहां से यह निकल गया।
मेरे ही नहीं आपके घर में भी
अरे सच में
बिलकुल सच!
मुझे इन कचड़ों को देखकर
लगता है जल्द ही मेरा शहर भी
उन बड़े शहरों में शुमार हो जाएगा
जहां कूरे कचड़े की अब नदी बहती है
मगर अभी नहीं
मेरे शहर में अभी और विकास होना है
सच में।
कसम से।
अक्सर मैं यहां से छुट्टियों में
किसी छोटे बड़े सिलसिले में निकल जाता हूं।
सच में मुझे
यह पसरता ढेर बहुत पसंद आता है
आए भी क्यों न
उनकी आज़ादी को देखकर
उनकी खुशी को देखकर।
इसी ढेर में वो
खुशनुमा मंजर भी है,
जिसे दोनों ने मिलकर बनाया है-
एक सूअर
और कौआ
दोनों एक नहीं हैं, अनेक हैं।
और हां दोनो एक भी हैं;
जाति, नहीं
रंग, हां
सोच, पता नहीं
आकार, नहीं
रूप, नहीं
विचार, हां
दोनों उस ढेर से
कुछ तो कम करने में लगे थे
कुछ कम नहीं
कुछ ज़्यादा ही।
उसे जिसे हम आप
नापसंद करते हैं-
कचड़ा
फैलाना नहीं,
साफ करना।
ये दोनों मुझे अच्छे लगे
एक संदेशवाहक लगे
मानवता के लिए
मानवतावादी के लिए
जनता के लिए
एक बड़ी आबादी के लिए।
उड़ान की थकान से थके कोवे को
सूअर की पीठ पर मिला था सहारा।
दोनों मिलकर इस जुगत में लगे थे,
अपार असीम गति से बढ़ते कचड़े का ढेर
कब काम हो जाए।
मगर आम आंखों को ये दोनों आम ही लगते हैं
और ये खास आम बनकर रह जाते है
सदा के लिए
हमेशा के लिए।
अतीत के दीवार पर बने किसी निशानी की तरह।
लंबे समय तक स्थिर रहने वाले चिन्ह।



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