दानापुर से सिकंदराबाद की यात्रा
दानापुर से सिकंदराबाद की यात्रा
28- 29 जून 2023
होटल अनुपम से दानापुर स्टेशन:
सुबह के लगभग 10:30 बज चुके थे मैं इस झटपट में था कि कब दानापुर स्टेशन पहुंच जाऊं ताकि 12:15 से में चलने वाली गाड़ी कहीं छूट न जाए हालांकि इस बात का अंदेशा कभी ना था कि गाड़ी छूट भी जाएगी क्योंकि मेरे पास पर्याप्त समय था मैंने यह भी चेक कर लिया था की स्टेशन रोड होटल अनुपम से दानापुर जाने में ज्यादा से ज्यादा आधा घंटा का समय लगता है फिर भी सुबह का वक्त और ट्रैफिक पर कोई भरोसा करने का इरादा भी ना था यही सोच कर जल्दी से ओला बुक कर लिया और ओला के ऑटो में चल दिया ओला वाले ने मेरे कॉल करने के अंदाज से ही उनकी दूसरी तरफ से कहा कि आप नीली पीली टीशर्ट पहने हैं मैं आपको देख चुका हूं मैं आ रहा हूं ओला ऑटो ऑटो चल चुके थे चल चुकी थी बीच में बारिश का मिजाज बदल गया कभी हल्की बारिश तो कभी तेज बारिश हुई सामान को बचाते दो पैक के साथ दानापुर स्टेशन आ गया मैंने उसका ऑनलाइन पेमेंट फोन पर के माध्यम से कर दिया ओला के प्लेटफार्म से ड्राइवर बहुत ही सदा हुआ था यंग था और अच्छी तरह से रास्ते को पहचानता था
स्टेशन पर स्नैक्स क्रय:
दानापुर स्टेशन पर पहुंचते हैं मन में इतना ख्याल था कि खाना कुछ नहीं खाया और ट्रेन में खाना कब आएगा क्या आएगा इस बात की कोई खबर नहीं थी यही सोच कर स्टेशन पर लगे स्टॉल से दो झालमुड़ी एक केक और एक मूंग दाल खरीद लिया बिना हर एक पैकेट के दाम पूछे और अंत में जब पूछा उसने कहा आपके ₹100 हुए मैंने भी झट से ₹100 अदा किया और अपने A2 सीट नंबर 51 की तरफ चल दिया ट्रेन के अंदर बैठते हैं इस बात का एहसास जरूर था की आर ए सी मिला है तो साइड बर्थ का आधा सीट दूसरे आदमी को और आधा सीट मुझे मिलना था मुझे यह बिल्कुल भी पसंद नहीं है कि कोई आए और बोले कि यह सीट हमारा है इसलिए मैंने उस दोनों सीट को अलग-अलग हिस्से में पहले ही सेट कर दिया ताकि आने वाला व्यक्ति जब चाहे आकर बैठ जाए बिना मुझे डिस्टर्ब किए कुछ देर बाद जब ट्रेन आगे बढ़ी तब बनारस के आसपास 234 वृद्ध या यूके है सीनियर सिटीजन पास के बर्थ पर आकर बैठ गए उनकी अपनी बातें होने लगी कुछ नहीं शिव के माता पर बात की कुछ नहीं है शिवोहम की बात की मातम की चलती रहे सब तेलंगाना में नागार्जुन के दर्शन के लिए जा रहे थे जहां के शिव मंदिर मशहूर है सर मैं इस दौरान चुप ही रहा मुझे अक्सर सफर में लोगों से बातें करना पसंद नहीं है मैं अक्सर अकेला चुपचाप शांति से जाना चाहता हूं मगर फिर कुछ देर के बाद ट्रेन आगे गई और रुक गई इलाहाबाद में जिसे लोग आज प्रयागराज के नाम से भी जाने लगे हैं क्योंकि वर्तमान पदस्थ मुख्यमंत्री योगी ने इनका नाम बदल दिया है साथी मुगलसराय का नाम पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन भी कर दिया गया है पिछले कई सालों से जब ट्रेन वहां जाकर रुकी 24 सीनियर सिटीजन में से एक्ने उस सीट को बर्थ नंबर 4 से बदलने की गुजारिश की पहले तो मैंने उसका चेहरा देखा देखने से संभ्रांत पूरा परिवार का लग रहा था मन में था कि यह आधा सीट ही मेरा है उसे पूरा सीट चाहिए था फिर मैंने प्रकट में भी वही बात कही जड़ से उसने पास में खड़े टीटीई से कंफर्म करने की कोशिश की और वह सफल रहा बात पता चले कि वह आरएसी नहीं था आप और मेरे लिए कंफर्म हो चुका था मुझे इस बात की भी खुशी थी कि चलो अब बैठे-बैठे कमर में दर्द नहीं होगा कम से कम आराम से सो कर इतनी लंबी यात्रा पर जा सकूंगा फिर क्षण में ही मैंने अपनी सीट को बदलने के लिए तैयार हो गया झट से अपना बैकपैक उठाया और ट्रॉली बैग लेकिन तब तक उन चारों के भीड़ से एक आवाज आई कि इनको मदद कर दो प्रकट में मैंने कहा नहीं नहीं रहने दीजिए कोई बात नहीं साहब जी मगर वह मानने वाले नहीं थे उन्हें इस बात की खुशी थी कि वह चारों एक साथ बैठकर जा सकते थे आराम से उनका रास्ता कट जाता एक तभी आकर मेरा ट्रॉली बैग थाम लिया और बर्थ नंबर 4 तक पहुंचा दिया मुझे उनके इस उत्सव पर खुशी हो रही थी क्योंकि अक्सर इस उम्र में लोग फ्रस्ट्रेट दिखते हैं जिन्हें जल्दी किसी बात पर गुस्सा आ जाता है मगर यह चारों उस मिजाज के नहीं लग रहे थे क्योंकि यह धार्मिक यात्रा पर निकले थे जब मैं बर्थ 4:00 पर पहुंचा वहां ऊपर वर्ष पर बैठने के बाद नीचे बर्थ वाले ने जो अपने फैमिली के साथ था जिनके दो बेटे थे एक पत्नी थी, पूछा कि आप अपना जगह बदले मैंने कहा हां कहां जाएंगे मैंने कहा सिकंदराबाद फिर मैं चुपचाप खुशवंत सिंह की ए ट्रेन टू पाकिस्तान नवल पढ़ने लगा हालांकि मेरे पास जयशंकर प्रसाद की सर्वश्रेष्ठ कहानियां भी थी मगर मैं चुपचाप उसी में तल्लीन था बीच-बीच में मैं कभी प्रभुजी धर्म ही खाया कभी चाय मंगवाया फिर कभी मूंग की दाल का आनंद लिया इससे यात्रा आगे बढ़ती रहें पर इसी बीच मुझे इस बात का भी पता चल गया कि यह लोग सिर्फ नागपुर तक जाएंगे हीरो नालंदा के आसपास के ही रहने वाले थे उनके बात करने के ढंग से पता चलता था पत्नी बार-बार अपने परिवार के समस्त समस्याओं को लेकर अपने पति से साझा कर रही थी बीच-बीच में फोन पर वह अपनी जेठानी से भी बात कर रही थी अपने रिश्तेदारों से बात कर रही थी जिसका सार यही था कि वह बहुत समझदार स्त्री है उसके साथ परिवार में जो गलत हो रहा है उसे वह बखूबी समझती है भले वह देवरानी होने के कारण परिवार में कुछ भी नहीं बोलती है उसकी उसके साथ के साथ जरा भी नहीं बनती है उसे इस बात का दुख था कि उसकी सासू मां ने उसे चलते समय कुछ भी खाने पीने के लिए नहीं दिया जबकि वह इस बात को जानती थी कि उसकी पता हो उसके बेटे के साथ उसके दो बच्चों के साथ जा रही थी इसलिए उसने इस बात का कसम भी खा लिया कि अगर वह अपने बेटे को नहीं मानती है अपने पतोहू को नहीं मानती है तो वह भी अपने बेटे को यह जानने ही नहीं देगी कि उसकी कोई दादी भी है उसका पति रेलवे में कर्मचारी था इस बात की भी खबर मुझे हो गई उसने बीच-बीच में अपने पति से बात करते हो फोन पर बात करने के दौरान यह जाहिर कर दिया कि उसकी सास अपने दामाद को बहुत मानती है अपने बेटी को बहुत मानती है मगर उसे ही नहीं मानती है
ट्रेन पर समोसा:
मैं यह सोच रहा था की खाने में कुछ ले लिया जाए तब तक हमेशा की तरह ट्रेन पर पैंट्री से समोसा लेकर वह बेचने वाला आ गया मैं समोसा लेकर खा लिया थोड़ी राहत मिली खाने का आर्डर लेने आया था दोपहर में मगर मेरी इच्छा नहीं थी ट्रेन के खाना खाने का क्योंकि ₹80 का खाना और 130 का खाना दोनों में अब अंतर हो चुका था कभी वही खाना 80 में मिलता था आज उस में फर्क था दाम बढ़ने के साथ उसकी क्वालिटी और क्वांटिटी दोनों में अंतर कुछ भी नहीं दिखता था फलता मैंने सोचा की ऐप की मदद से खाना मंगवा लिया जाए और मैंने वही किया।
ट्रेन पर होटल से खाना ऑर्डर, वाराणसी जंक्शन: दानापुर से गाड़ी खुल जाने के बाद कई घंटे बाद ही मैंने फूड आर्डर कर दिया जो मुझे बनारस स्टेशन के आसपास के किसी रेस्टोरेंट से मिलने वाला था साथ में यह उम्मीद थी कि बनारस है शाम में 10 साल रहा हूं अपने ग्रेजुएशन B.Ed पोस्ट ग्रेजुएशन और डिप्लोमा इन ट्रांसलेशन के समय।
डिलीवरी बॉय का अच्छा व्यवहार:
बनारस पहुंचते हैं गाड़ी 10 मिनट के लिए रुकी यहां मैं सोच रहा था कि खाना कब आएगा हां आ गया उस डिलीवरी करने वाले व्यक्ति का व्यवहार बहुत ही अच्छा लगा वह चुपचाप दिया और चुपचाप चला गया उसके चुपी में भी कई सवाल और कई जवाब उसी के साथ चले गए जिसको मैं कुछ समझा और कुछ नहीं समझ पाया
जबलपुर नागपुर के बीच रूट डाईवर्जन:
जबलपुर से निकलते ही कुछ नए स्टेशन आए और लोगों के बीच यह बात तैरने लगी की जबलपुर और नागपुर के बीच ट्रेन का ड्राइवर जन हो चुका है मुझे कोई चिंता नहीं थी परंतु आसपास या नागपुर पहुंचने वालों के मन में इस बात की चिंता थी कि शायद देर ना हो जाए देर होना लाजमी था क्योंकि रूट डायवर्ट हो चुका था इटारसी के पास आस पास रेलवे लाइन भारी बरसात के कारण वह गई थी या यूं कहें उसके आसपास की मिट्टी कट गई थी रेलवे के संज्ञान में आते हैं रेलवे रूट पर ट्रेन का संचालन बंद कर दिया और फिर गाड़ियों को नागपुर के बीच डायवर्ट कर दिया गया इसी डायवर्ट शब्द को वह स्त्री फोन पर डीवार्ट कह रही थी। जिससे उसके अंग्रेजी ज्ञान का मुझे पूरा आभास हो गया हवा बीच-बीच में नालंदा के आसपास की भाषा बोलती और कभी हिंदी बोलती थी।
बीच में कई जगह पर देर तक गाड़ी का रुकना:
रूट क्लियर नहीं होने के कारण ट्रेन को बहुत देर तक किसी किसी स्टेशन पर रोक कर रखा गया और तह समाज से चलने वाली ट्रेनों को पास दिया गया मैं ऊपर बैठा कभी सो जाता है कभी उठ कर बैठ जाता कभी फिर सो जाता कभी कुछ लिखता कभी थोड़ा पड़ता है फिर बंद कर देता सोते-सोते भी व्यक्ति थकता है इस बात का एहसास आपको तब होता है जब आप किसी जगह बहुत देर तक बैठे रह जाते हैं या बहुत देर तक लेटे रह जाते हैं वरना आपको यह बात बिल्कुल भी हजम नहीं होगा कि कोई व्यक्ति बैठे बैठे कैसे थक सकता है सोते-सोते कैसे थक सकता है
गोंदिया जंक्शन पर देर तक रुकना:
अन्य स्टेशनों की भारती जी गोंदिया जंक्शन पर सिकंदराबाद सुपरफास्ट एक्सप्रेस को रोक दिया गया और वह भी 3 घंटे तक या उसके आसपास रोका गया
बीच बीच में चाय प्रभुजी झालमुरी और मूंगदाल का सेवन: गाड़ी रुके होने के कारण और बोरियत के एहसास से मैं कुछ खा पी कर अपने मन को बहलाने की कोशिश करता रहा
नागपुर जंक्शन से फूड ऑर्डर:
लगभग 7:21 के आसपास मैंने खाना बुक कर लिया जो मुझे 11 -11:15 के आसपास मिलने वाला था नागपुर में।
नागपुर जंक्शन पहुंचने का बेसब्री से इंतजार:
12 से आगे समय की सुई जा चुकी थी यही सोच कर मन में इस बात की जल्दी थी कि नागपुर पहुंच जाऊं तो वहां खाने के लिए अच्छे व्यंजन मिलेंगे जिसे खाकर मिजाज खुश हो जाएगा
भूख की अनुभूति से बचने के लिए 30 का दो समोसा, गोंदिया जंक्शन: गोंदिया जंक्शन तक आते-आते और वहां रुकने के वास्ते मुझे भूख लग गई और स्टेशन से एक बेचने वाला आ गया मैंने उसका समोसा लिया जबकि 30 के दो ही मिले ट्रेन में बेचने वाला पैंट्री कार से 30 का 3 देता था इस बाहर से आने वाले के समोसे में कड़ापन ज्यादा था जिसे शायद मक्का के आटे से बनाया गया था और स्वाद को एक खास नहीं था फिर भी बेबसी का मारा आदमी क्या नहीं करता है मैंने उसे बहुत ही जवानी है खाने की कोशिश की लेकिन सफलता नहीं मिली।
ट्रेन का तीन समोसा बीस रुपया:
जब पैंट्री कार का समोसा बेचने वाला उस कोच में आता तो उसका मूल्य 3 समोसे के बदले ₹20 होता और उसके स्वाद भी अन्य समोसा की तुलना में बहुत ही अच्छा रहता। हर मुझे वह अवसर फिर से मिला और मैंने ₹20 देखकर 3 समोसा खरीद लिया जिसका स्वाद मन मुताबिक था अन्य समोसे की तुलना में।
बाहर तेज बारिश:
रेल गाड़ी रूकती चलती अपने मंजिल की तरफ बढ़ती जा रही थी बाहर कभी तेज बारिश से सामना हो रहा था तो कभी धीमी बारिश की बूंदों से खैर ट्रेन के अंदर यात्रियों को बारिश के इस बदलते सभाओं से कोई लेना-देना नहीं था पर मुझे इसका ख्याल जरूरी था क्योंकि यह तत्व ही मेरे कहानी के प्रमुख पात्र चरित्र बन पाते हैं और इनसे मेरी कहानी पूरी हो जाती है
अंततः नागपूर जंक्शन 5:50पहुँचना:
रेलगाड़ी के लिए बनाए गए एप्लीकेशन वेयर इज़ माय ट्रेन बिल्कुल काम नहीं कर रही थी जब तक की ट्रेन नागपुर जंक्शन नहीं पहुंच गई मैं जब भी कोशिश करता कि यह पता करो कि मेरी रेल गाड़ी अभी कहां खड़ी है तब तब मुझे निराशा ही हाथ लगती और स्क्रीन पर यह दिखता कि आपकी रेलगाड़ी नागपुर जंक्शन और जबलपुर के बीच डायवर्ट कर दी गई है और इस कारण मैं अक्सर गूगल मैप पर चला जाता जिसमें यह जानकारी मिलती थी अब नागपुर जंक्शन कितनी दूर है क्योंकि मुझे इतना पता था कि नागपुर जंक्शन के बाद से इस गाड़ी को ट्रैक करना बहुत ही आसान था क्योंकि आपने पुराने पथ पर ही चलती।
स्टेशन पर खाना डिलिवरी का न होना:
जिस खाना को 11:30 या 11:15 बजे के बीच में डिलीवरी होना था अब समय की सुई 5:30 बजा रही थी मैं यह सोच रहा था कि गाड़ी नागपुर जंक्शन आ गई है इतनी उम्मीद जरूर है कि खाना आ जाएगा।
इ कैटरिंग कॉल सेंटर में बात डिलीवरी का आश्वासन:
खाना मैंने वेज दम बिरयानी ऑर्डर किया था गाड़ी नागपुर जंक्शन पर 5 मिनट के लिए रोती थी मगर यह सब सिर्फ सोच सोच बनकर रह गए मैंने दो बार ही केटरिंग सर्विस के कस्टमर केयर को भी कॉल किया और मुझे सांत्वना मिली कि आपका खाना आप किस सीट पर डिलीवर कर दिया जाएगा जब मैंने देखा कि अब गाड़ी खुल रही है फिर मैंने कोशिश की संपर्क साधने की मगर इस बार भी मुझे यह जवाब मिला कि आपकी सीट तक आपका खाना पहुंच जाएगा मैंने उसे साफ लफ्जो में कहा कि गाड़ी खुल चुकी है मेहरबान तो उसने कहा अच्छा हम देख लेते हैं आपको रिफंड कर दिया जाएगा फिर मैंने खामोशी साधना ही अच्छा समझा और फिर से एक बार मैंने बल्लारशाह स्टेशन के लिए खाना बुक कर लिया।
नागपूर जंक्शन के बाद गाड़ी का नियमतः चलना
गाड़ी जब नागपुर स्टेशन से खुल गई तब भी मैंने स्टेटस चेक किया जिसमें लिखा था कि आपकी गाड़ी 6 घंटे 57 मिनट देरी से चल रही है फिर मैंने अंदाज़ लगाया कि यह गाड़ी सिकंदराबाद स्टेशन कब पहुंचेगी उसमें टाइम दिखा रहा था 3:30 बजे के आसपास फिर मेरे पास खामोशी चुप्पी के सिवा कुछ भी ना था सो मैं चुप हो गया।
बल्हारशाह जंक्शन में फूड डिलीवरी प्राप्ति
बलहरशाह जंक्शन में अंतर भोजन की सफल पूर्वक डिलीवरी कर दी गई और मैं खाना खाने लगा खाना में चावल चिकन पनीर दाल दो चपाती और सड़ा जैसा खीरा सुखी गाजर के सलाद मिले थे। टैक्स को जोड़ने के बाद उस खाने का मूल्य ₹167 था चावल एक छोटे से डिब्बे में चिकन एक छोटे से डिब्बे में अपने मात्रा के अनुसार सिमटा हुआ पैकेट में मिला।
अंततः सिकंदराबाद जंक्शन 3:36 पूर्वाह्न पहुंचना:
खाना खा लेने के बाद मन में इतना था कि अब समय बीत जाएगा और मैंने कुछ भी और खाने की ना सूची हालांकि अभी शाम के 7:00 बजने वाले थे कभी इस करवट लेता तो कभी उस करवट लेता कभी पावर बैंक को चार्ज करता तो कभी मोबाइल की कम हो रही बैटरी परसेंटेज को देखता तो कभी सोचता किया नावेल ट्रेन टू पाकिस्तान खुशवंत सिंह के द्वारा लिखा गया पढ़ लो मगर जीना लगता था मन में एक ही बात रखी थी कि स्कूल के लिए कहीं लेट ना हो जाऊं इलाके इतना भी पता था कि हमने वाइस प्रिंसिपल को इसकी सूचना पहले ही दे दी है मगर मैं चाहता था मैं जल्दी पहुंच जाऊं और आराम कर सकूं मगर ऐसा होना नहीं था।
प्लैटफॉर्म नंबर 1 पर टॉयलेट के लिए खोजबीन (हाउसफुल)
प्लेटफार्म नंबर 8 पर उतरने के बाद मैं जल्दी से प्लेटफार्म एक पर आ गया क्योंकि अक्सर यह देखने में मिलता है की प्लेटफार्म में एक से सटा हुआ ही कोई शहर या कोई टाइम होता है हालांकि मैं इस बात से पूरी तरह से जागृत था की प्लेटफार्म एक पर ही सारे काम आवश्यकता के अनुसार पूरे हो जाते हैं रात के बाद कई घंटे बीतते गए और फिर सुबह का समय आ गया घड़ी पर इस समय 3:36 हो रहा था मैं बस यही सोच कर खुश था की गाड़ी सिकंदराबाद स्टेशन पर पहुंच गई थी और मुझे ऑफिस में रिपोर्ट करने में बहुत ज्यादा देर नहीं होने वाली थी मेरे मन में यह पहले से ही चल रहा था कि अगर अभी जाकर मैं जुबली बस स्टैंड जेबीएस से अगर कोशिश भी करूं कि बस पकड़कर चला जाऊं तो मन इस बात की गवाही नहीं दे रहा था कि मैं इतना थका हूं पहले से टूटा हूं इतनी लंबी यात्रा के बाद भी शरीर में कोई हिम्मत शेष हो कि उस बस में बैठे जो बस चले रुके और चलते-चलते रुके रुकते रुकते चल उसका कई जगह ठहराव हो और मेरे साथ दो बैग हो यह मुझे मुश्किल से लगा इसलिए ओला लेकर विद्यालय जाना ही मेरा विचार था मैं झट से प्लेटफार्म नंबर वन पर आकर टॉयलेट खोजने लगा मैं चाहता तो ट्रेन के अंदर भी फ्रेश हो सकता था लेकिन थोड़ी जल्दी मची थी कि चलो बाहर निकल जाए सब लोग बाहर निकल रहे हैं समान का सुरक्षा भी मेरे मन में था किसी विचार की तरह प्लेटफार्म नंबर वन से बाहर निकलते ही मैं बाई तरफ गया जहां सुलभ शौचालय लिखा था मुझे इस बार का जरा भी ध्यान नहीं रहा कि सुबह का वक्त है हर जगह भीड़ ही भीड़ होगी बस मुझे अपना ख्याल था अपनी तैयारी थी वहां पहुंचते ही देखा कि लोग लाइन में लगे हैं मैंने बाहर से ही उस केयर टेकर से पूछा क्या साहब हाउसफुल है क्या उन्होंने भी वहां से जवाब दिया हां सर हाउसफुल है भीड़ है मैं तुरंत अपने ट्रॉली को पीछे की तरफ मोड़ लिया और पुनः प्लेटफार्म नंबर वन पर चला गया मुझे यह बात अभी दिमाग में थी कि जब प्लेटफार्म नंबर वन पहुंच रहा था तो पहले मैंने ऐसी प्रतीक्षालय एसी वेटिंग हॉल में पूछा कि बाथरूम जाना है उसने मुझे सेकंड क्लास वेटिंग हॉल की तरफ इशारा किया हालांकि उसे इस बात की जरा भी खबर नहीं थी खबर होती वीडियो कि मैं अभी सेकंड एसी क्लास से ही आया था मैंने भी अपना टिकट दिखाना उसे मुनासिब समझा और मैं सेकंड क्लास वेटिंग हॉल की तरफ गया वहां पर स्नानागार बाथरूम पहले से ही फिर मेरी हिम्मत नहीं हुई मैं चुपचाप बाहर आ गया और फिर से यह सोचकर प्लेटफार्म नंबर एक की लंबाई को मापने लगा देखा कि प्लेटफार्म पर कुछ दूर चलने के बाद लाल रंग के तीर के निशान इस बात का इशारा कर रहे थे की आगे की तरफ टॉयलेट है मैं उस तीर के निशान को बार-बार फॉलो करता रहा ट्रॉली बैग का पहिया अपने गति से मेरे साथ आगे की सकता गया और अंततः मैंने वह टॉयलेट देख लिया जहां पर मैं नित्य क्रिया से निवृत्ति प्राप्त कर सकता था जाते हैं साहब से पूछा साहब खाली है क्या जवाब में कहा देखिए मैनेजर से अपना सामान दोनों बैग उसके टेबल के सामने रखा हालांकि जो साधारण लोग आ रहे थे उसे बिना पैसा के अंदर जाने नहीं दे रहा था लेकिन उसने मुझसे पैसा नहीं मांगा मैं भी अपने कॉन्फिडेंस के बलबूते अंदर जाकर पहले कोई नहीं जा रहा है मैंने वहां पहले से खड़े एक व्यक्ति से पूछा क्या साहब आप भी लाइन में खड़े हैं उसने हां में जवाब दिया और कहा कि बगल में एक रूम खाली है लेकिन यह वेस्टर्न है मैंने मौका को ना गम आते हुए जल्द ही उसे खोल कर देखा खोलकर देखने के बाद का दृश्य मन को दुखी कर गया अंदर पानी की व्यवस्था थी अच्छी थी लेकिन कमोड पर किसी ने उसे पीरदान समझकर उसे रंगीन कर दिया था अपने रंगीन थूक से फिर मैंने समय की मांग को समझते हुए अपने साथ लाए टिशु पेपर सेव को मोड को पहले धो कर फिर उसे वाइप आउट किया फिर उसका प्रयोग किया हां अब इस बात की गारंटी थी कि मेरे पास जो भी वहां जाता उसे इस बात की खुशी होती है कि हमेशा लोगों से पटे रहने वाला या टॉयलेट भी आसानी से प्रयोग किए जाने के लिए तैयार बैठा था मुझे निकलते हुए भी वहां से खुशी हो रही थी मैं जाकर बाहर उस व्यक्ति को ₹20 दे दिया मुझे इस बात की खबर नहीं है कि उसके लिए मुझे उसे ₹10 देना था या ₹20 देना था मेरा काम हो चुका था निवृत्ति प्राप्त हो चुकी थी और उसकी छोटी सी कहानी कि यह प्लेटफार्म के बीच में था बाद में लोगों ने उसे लास्ट में टेंपरेरी टॉयलेट बनाकर वहां खड़ा कर दिया सुनकर वहां से बाहर की तरफ निकल पड़ा अब मैं गेट नंबर 3 के पास बाहर में खड़ा था खड़े-खड़े मैंने ओला टैक्सी को फोन किया राइट बुक की मगर स्क्रीन पर यह संदेश आया कि आउटस्टेशन के लिए आपको 12 से 15 मिनट का वेट करना पड़ेगा मैंने वेट किया पास से गुजरते किसी ऑटो वाले ने पूछ लिया क्या सब आपको कहां चलना है मैंने कहा कहीं नहीं चलना है बाद में उसके कोई नहीं आया यह पूछने कि आप कहां-कहां जाएंगे क्योंकि मेरे खड़े होने के ढंग और मोबाइल में व्यस्त दिखने के अंदाज से शायद कोई इस बात के लिए तैयार ना था कि वह मुझसे यह पूछे कि आप कहां जाएंगे पास में पीछे बैठे जमीन पर यूपी-बिहार से आए कई लोग थे अपने परिवार के साथ उनकी भीड़ थी जहां चाय वाला अक्षरा का चाय चाय चाय चाय चाय चाय चाय चाय चाय चाय चाय चाय मानव मानसिक प्रताड़ना देकर अपनी चाय बेचने के लिए व्यवस्था या उसकी आदत बन गई थी और लोग चाय खरीद भी रहे थे चाय का नवाबी शौक उन मजदूरों के बीच भी इतना मशहूर था यह देखकर मुझे खुशी भी हुई और दुख भी हुआ बहर हाल उनकी अपनी पसंद थी।
प्लैटफॉर्म नंबर एक के बाहर गेट नंबर 3 के पास ओला कैब का इंतज़ार:
कॉल का ऑप्शन देखते ही मैंने ड्राइवर को कॉल किया उसने पूछा आपको कहां जाना है मैंने बता दिया 12:15 मिनट बीतने के बाद वह कार लेकर आ गया मैं बार-बार उसके कार्य का नंबर पता कर रहा था और तब तक आ गई कार के नंबर को देखने के बाद मैं जब से बैठ गया उसने ओटीपी पूछा मैंने ओटीपी बता दिया। मेरा दोनों बैग पीछे रखा गया था ड्राइवर ने मुझसे पूछा कि किराया कितना डिस्प्ले हो रहा है मैंने उसे 2935 ₹100 कहा उसने कहा कि उसे 3000 का चिल्लर दिखा रहा है मैंने कहा ठीक है अगर आप बोलो तो अभी पेमेंट कर देता हूं फोन पर से या बाद में उसने कहा बाद में कीजिए उसका किराया बढ़ेगा मैंने कहा ठीक है उसने कहा आपको टोल टैक्स भी देना होगा मैंने कहा ठीक है गाड़ी आगे बढ़ गई पठान चेरो के वास्ते होते हुए थोड़ा दूर जाने के बाद मैंने उससे पूछा अगर आपको चाय पीनी हो तो बताओ उसने कहा ठीक है हम लोग आगे चाय पिएंगे कुछ ही देर में ताज रेस्टोरेंट के पास जिसे कई मुस्लिम मिलकर चलाते हैं उसने गाड़ी रोक दी मैं बाहर आ गया मुझे या लगा दूं या दो मर्तबा तो जरूर आ चुका सुबह-सुबह वहां पर इडली और चटनी तैयार था हम दोनों ने 33 इटली एक एक चाय मैंने तीन बिस्किट भी खाई लेकिन उस दिन में से सिर्फ दो ही खाई एक पास में खड़ी महिला जो कुछ मांग रही थी उसे दे दिया उसके गोद में एक बच्चा था सहरसा लेकर चली भी गई मगर उसके मन में शायद यह था कि हमने कुछ पैसा दे दे इटली और चाय की समाप्ति के बाद मैंने ₹100 पेमेंट कर दिया 30 ₹30 नाश्ता के ₹20 चाय के₹10 बिस्किट के और 10 पानी के आधा लीटर।
4:40 पूर्वाह्न पठान चेरु होते हुए निजमसागर एन s एच 161की यात्रा:
मु रास्ते में मुझे बैठे-बैठे नींद भी आ रही थी मगर मैं यह भी सोच रहा था कि कहीं ड्राइवर को बुरा ना लगे कि सामने बैठा उनका को पैसेंजर सो रहा है और कहीं उसे डिस्टर्ब ना हो जाए ड्राइविंग करने में लेकिन जहां तक मैंने इस बात को समझा मुझे लगा कि उसे इस बात से कोई दिक्कत नहीं थी क्योंकि वह अपने ड्राइविंग में पारंगत लग रहा था वह लड़का कर्नाटक का था उसके बातचीत के अंदाज से मुझे लगा कि वह ओरिया बोलना था वह तेलुगु बोल रहा था मगर जल्द ही मैंने अपने इस संशय की स्थिति को दूर कर लिया जब उसने बताया कि वह कन्नड़ बोल रहा था हैदराबाद से निकलते हैं कुछ दूर तक वह अच्छे-अच्छे हिंदी गाने बजाता रहा फिर बीच में उसने अपने मातृभाषा कन्नड़ गाना शुरू किया जिसे मैंने समझने की पूरी कोशिश की मगर उसके संगीत के अलावा कुछ और समझ ना सका उसके धुन बॉलीवुड के गीत से मिलते जुलते थे और पूरी तरह मिलते-जुलते थे मुझे लगा कहीं बॉलीवुड वालों ने कन्नड़ गीत के संगीत को कॉपी तो नहीं किया या फिर यह भी हो सकता था कि कन्नड़ गीत बॉलीवुड के गीत की कॉपी थी खैर जो भी हो दोनों भाषाओं में संगीत को सुनना अपने आप में आनंददाई लगता है। मुझे लगता है कि पठान चेरु से निकलने के बाद एनएच 161 आ गया और फिर वह एन एच पितलाम से निजामसागर की तरफ मुड़ने तक हमारे साथ चलता रहा कार की सामान्य स्पीड के साथ मैं 7:17 विद्यालय कैंपस में आ गया।
7:19 ज. न. वि. निजामसागर पर मेरी यात्रा खत्म हो गई।
कृष्णा कुमार गाड़ी चलाने में बहुत ही सदा हुआ लग रहा था वह गूगल मैप के मदद से लगातार बढ़ता जा रहा था वह क्षण जल्द ही आ गया गाड़ी अब पिटलम से होते हुए मागी में घुस चुकी थी हम लोग मैग के शुगर फैक्ट्री के बगल से गुजर रहे थे जल्दी हम लोगों ने वह पुल पार कर लिया जो निजामसगर में एंट्री करती है फिर वहां से मैंने उसे इशारा किया निजामसागर चौरस्ता से दाएं तरफ मिलने के लिए क्योंकि इसके गूगल मैप में मोड़ने का सिंबल देर से आ रहा था फिर आगे चलकर मैंने उसे बताया कि लेफ्ट साइड में निजाम सागर बस स्टैंड है और फिर आगे जाकर मैंने उसे बताया किलर शायरी निजाम सागर डैम है जो बहुत मशहूर है। उसने भी चलते-चलते और अपने ड्राइविंग पर ध्यान को केंद्रित रखा।
गाड़ी मेरे कमरे के नीचे आकर खड़ी थी मैंने बाहर निकल कर उससे उसका किराया पूछा उसने मुझे टोटल बता दिया टोल टैक्स सहित पूरा किराया 3700 ड्राइवर को चुकता करने के बाद मैंने उसे कहा कि वह सीधा जाए और वहां से बाएं ले ले फिर वह स्कूल से बाहर की तरफ निकल जाएगा नीचे के के वेणुगोपाल उसकी मैडम साफ सफाई कर रही थी दोनों को मैंने नमस्ते किया मेरी गाड़ी बाहर खड़ी थी जिसे उसने कहा कि 2 दिन पहले ही उसने बाहर किया कि कि नीचे फैमिली आई है बीवी नायडू की मैंने कहा कोई बात नहीं है तो अपनी ही गाड़ी है उसने हमारा हालचाल पूछा मैंने अपना हाल-चाल बताया सब ठीक-ठाक था हालांकि मेरे मन में या अंदेशा था कि बंदर ने मेरे गाड़ी को गंदा कर दिया होगा ऐसा बिल्कुल भी नहीं हुआ था गाय ठीक-ठाक थी सारथी हल्का सा साफ करने के बाद गाड़ी पुनः प्रयोग के लिए तैयार थी उसके बाद विद्यालय की गतिविधियों में लीन होने के लिए मैं अपने कमरे में आ गया जहां मुझे सफाई उसके बाद स्नान और पुणे तैयार होकर स्टाफ रूम जाकर अपार(APAR) का फॉर्म भरना मन में था।


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