स्टेशन रोड का चूहा
सब तेज चलते
आते जाते लोगों की तरह।
मैं भी चल रहा था,
कहीं से आना था
कहीं को जाना था।
मन में कुछ सवाल थे
चलते रस्ते की मंज़िल पर
पड़े कहीं जवाब थे।
आंखें टिकी कहीं
चलते पैर बेहिसाब थे।
तभी देखा उसी रस्ते पर
सूखा मरा एक चूहा
आज नहीं वो कल मरा था
कल नहीं परसों मरा था।
फिर मन ने माना
और मैंने मन की बात
मगर फिर सोचने को बेबस,
कई दिन पहले मरा होता
तो अब तक निशान
नहीं बचा होता।
हां मरा भी होगा
लोगों ने माया से उसे कम कुचला होगा।
कोई कुचलते कुचलते छोड़ा होगा
कोई उसपर पड़ते पैर को पीछे खींचा होगा।
भला इस चूहे का,
निकलता दम, फिर वापस दौड़ा होगा।
जान में जान उसके आया होगा।
मगर सब एक जैसे कहां?
फिर किसी ने उसे
जाने अंजाने में कुचला होगा
किसी ने शौक से
किसी ने जल्दी में
किसी ने बेबसी में
उस कुचले को फिर से कुचला होगा।
और सब खत्म।
आखिर चूहा ही तो है।
कौन सा बड़ा जानवर!
जो कोई उसकी फिक्र करता।
या फिर
आज ही मरा होगा।
नहीं उसे मारा गया होगा
किसी के रास्ते में आ गया होगा
किसी को आँखें दिखाया होगा।
रास्ते में अड़ गया होगा।
तो क्या?
कोई कुचल देगा।
कोई मार देगा।
कोई दबा देगा।
हाँ?
नहीं?
पता नहीं।
पर एक बात तय थी
वह मर चुका था
किसी को इस बात का फर्क नहीं परता था
शायद इसलिए कि
ऐसे चूहों का मरना
या इन्हें मारना आम बात थी।
मगर कब तक?
महीनों?
साल?
सदियों?
पता नहीं
में निःश्ब्द हूं।...



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