सड़क की नींद और घर की नींद
सड़क की नींद और घर की नींद
इस साल कुछ ज्यादा गर्मी है
या फिर मुझे ज़्यादा लग रही है
रात के अंधेरे का ख्याल
कौन करे?
मगर नींद का ख्याल ज़रूर रहता है।
आप उतने अमीरी में न हों,
और एसी से आपकी बाबस्तगी भी न हो
फिर तो उमस की रात
उमस की बिस्तर
और फिर उमस की नींद
उमस ही ख़्वाब
ख़्वाब ही उमस,
और फिर उमस ही उमस
बस उमस ही उमस
करवटों में उमस
उमस में करवट
ख़ैर जो भी
मैं ताज़ी हवा खाने आ गया
बाहर,
मगर घर के कमरे से बाहर ओसारा
ओसारा से सटा आंगन
और आंगन से दूर रात दिन जागती सड़क
और उस सड़क पर नींद से
उलझती आंखें
और आंखों में तैरती नींद।
कुर्सी पर मैं बैठा
नींद मुझ पर बैठा
नींद मुझसे और मैं नींद से
दोनों एक दूसरे से रहे उलझे
मगर झपलाती, ऊंघती आंखों से
उस अंधेरे में सड़क की लंबाई
पर भागती दौड़ती गाड़ी में
ऊंघते ड्राईवर की आंखों को
मैं चुपचाप देख रहा था
बस देख रहा था,
बस सोच रहा था।
हम घर में सो रहे थे
वो सड़क पर दौड़ रहे थे।
वो भाग रहे थे।
हम दोनों ही उलझे हैं
ज़िंदगी की उलझनों में।
एक घर में
एक सड़क पर
एक को सड़क पर जाना था
एक को सड़क से घर में जाना था
फिर दोनों उल्टी दिशा में
भागने वाले थे,
बस एक समयांतराल के बाद।
बस एक समयांतराल के बाद।



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